यहाँ प्रस्तुत सभी नज़्में निदा फ़ाज़ली के सम्पूर्ण काव्य-संकलन ‘शहर में गाँव’ से ली गई हैं। यह संकलन मध्य-प्रदेश उर्दू अकादमी, भोपाल के योगदान से शाया हुआ है।

लिप्यंतरण: आमिर विद्यार्थी

नाराज़ आदमी

उसने
समुन्दर को अपनी बाँहों में समेटना चाहा
समुन्दर
उसकी बाँहों में नहीं समा पाया
उसने नाराज़ होकर
समुन्दर से मुँह मोड़ लिया

उसने
आसमान को छूना चाहा
आसमान
अपनी ऊँचाई से नीचे नहीं आया
उसने नाराज़ होकर
आसमान से रिश्ता तोड़ लिया

उसने दुनिया को जीतना चाहा
दुनिया ने
उसे ताज नहीं पहनाया
उसने नाराज़ होकर
दुनिया का साथ छोड़ दिया

फिर वो
समुन्दर, आसमान और दुनिया में
किसी का नहीं था
लेकिन उसे ये जानकर दुःख हुआ
कि उसके बग़ैर भी
समुन्दर यूँ ही मचलता रहा
आसमान यूँ ही रंग बदलता रहा
दुनिया का कारोबार
यूँ ही चलता रहा।

नया देवता

वह जब तक जिया
दूसरों को बेवक़ूफ़ बनाता रहा
रिश्वत
बेईमानी
झूठ
हर तरीक़े से दौलत कमाता रहा
और अपने जीते जी
अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा के
उन्हें बा-इज़्ज़त शहरी बना के
सुकून के साथ मर गया
क्या ज़रूरी है
हम हर बार उसी को देवता बना कर पूजें
जिसमें कोई भी इंसानी बुराई न हो।

एक बात

उसने
अपना पैर खुजाया
अँगूठी के नग को देखा
उठकर
ख़ाली जग को देखा
चुटकी से एक तिनका तोड़ा
चारपाई का बान मरोड़ा

भरे-पूरे घर के आँगन में
कभी-कभी वह बात
जो लब तक
आते-आते खो जाती है
कितनी सुन्दर हो जाती है।

जब तलक वह जिया

जब तलक वह जिया
चाय की केतली साफ़ करता रहा
भीगी बिल्ली-सा मालिक से डरता रहा

ताँगे वालों ने छेड़ा तो शरमा गया
कोई चिल्ला के बोला तो घबरा गया

जब तलक वह जिया
अपनी बीवी से हर दिन झगड़ता रहा
बात-बे-बात बच्चों से लड़ता रहा
रूह घुटती गई, दम उखड़ता रहा

जब तलक वह जिया
रोज़ जलसे हुए, रोज़ भाषण हुए
देस में जाने कितने इलेक्शन हुए।

मोहब्बत

पहले वह रंग थी
फिर रूप बनी
रूप से जिस्म में तब्दील हुई
और फिर जिस्म से बिस्तर बनकर
घर के कोने में लगी रहती है
जिसको
कमरे में घुटा सन्नाटा
वक़्त-बे-वक़्त उठा लेता है
खोल लेता है, बिछा लेता है।

निदा फ़ाज़ली की नज़्म 'ख़ुदा का घर नहीं कोई'

Book by Nida Fazli: