परिभाषा पीड़ की

‘Paribhasha Peer Ki’, a poem by Rahul Boyal

तुम्हारी व्यस्तताओं का मैं हुआ अभ्यस्त
रह गया हूँ केवल एक सरन्ध्र हृदय का स्वामी
जिससे रित रही हैं प्रतिपल तुम्हारे लौटने की आशाएँ
और भर रही है स्मृतियों की कंटीली समीर
जो है मेरे जीवित रहने का कारण एकमात्र।

तुम रहो व्यस्त कि
यही है स्तम्भ तुम्हारी प्रसन्नताओं का
बिल्कुल न होना मुक्त तुम
यूँ ही रहना दौड़ते भागते,
दायित्वों की देते रहना संज्ञा
इस अनावश्यक ऊहापोह को।

क्या बन जाना चाहते हो?
क्या बनके करोगे बड़ा?
इतने बड़े न हो जाना कि
सिमट ही न सको मेरी बाहों में
और वो बड़प्पन भी किस काम का
जिसमें होना पड़े छोटा तुम्हें
मुझमें समाहित होने के लिए।

अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं आज
वो पल जिनमें आनन्दित थे दोनों हम
एक पल सोचो ठहरकर कि
क्या नहीं सोचा था तुमने
ये पल अनगिनत करने के लिए?

मान भी लूँ कि तुम बन जाओगे धीरे-धीरे ध्रुव
पर नहीं रह पाऊँ सम्भवतः मैं धुरी
कहीं ऐसा न हो कि तुम हो जाओ ध्रुव दक्षिणी
और मुझे स्थापित कर दे समय उत्तर में।

महत्त्वाकांक्षाओं की इस असीम यात्रा से
कभी लौटा नहीं है कोई जाकर गन्तव्य से
तुम्हारी प्रतीक्षा में नहीं मिलेगा
जीवन को कोई भी उचित विशेषण
तुम लौट आये यदि मेरी मृत्युपूर्व
तो बतलाऊँगा तुम्हें परिभाषा पीड़ की
और वेदना टूटती आशाओं की।

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