पर पुरुष में स्त्रियाँ सदा प्रेमी नहीं तलाशती

Poems by Dr. Nidhi Agarwal

पर पुरुष में स्त्रियाँ सदा प्रेमी नहीं तलाशती

पर पुरुष में स्त्रियाँ सदा प्रेमी नहीं तलाशतीं
कभी-कभी वह तलाशती हैं एक पिता
जो संबल बने उनकी सभी असफलताओं का
और समझ सके उनकी अनकही व्यथा

पुरुष नहीं चाहता पिता होना
क्योंकि पिता होने के लिए कर देना
पड़ता है…
समस्त उच्छृंखलताओं का त्याग
बेटियाँ प्रेमिकाओं सी
नेत्रहीन नहीं होतीं
न ही उन्हें मीठी बातों से
भरमाया जा सकता है
वह देखना चाहती हैं
पिता को आदर्शों के उच्चतम
पद पर विराजे
पिता को पतनोन्मुख देख
मौन सिसकती हैं बेटियाँ

पुरुष, तुम कर लेना झूठा प्रेम
किन्तु…
पिता होने का झूठा स्वांग नहीं रचना
प्रेमियों के छल से,
कहीं गहरे वाक़िफ़ होती ही हैं प्रेमिकाएँ
किन्तु बेटियों ने नहीं देखा है
पिता का कलुषित होना।

मोह

जाने क्यों लोगो के बदल जाने पर
मन का मौसम ठहर जाता है
बदलना प्रकृति का शाश्वत नियम है
रात दिन में, दिन रात में बदलता है
सर्दी गर्मी बरसात नियम से
आते जाते हैं…
नियमों के भंग होने का भी
नियम उतना ही सत्य है!
बेमौसम बारिशें भी कोई
दुर्लभ घटना तो नहीं?
कितने सावन भी सूखे ही बीत जाते हैं
फिर तुम्हारे बदल जाने से बोलो तो
क्यों मन के सातों सागर रीत जाते हैं?

तुम्हारा प्यार चाँद जैसा
अपनी सुविधानुसार घटा-बढ़ा
फ़र्क़ बस इतना था कि
इस घटने बढ़ने का कोई
निश्चित क्रम न रहा
मैं पूनो के चाँद की गिरफ़्त में रही
और हिस्से में सदा अमावस ही आयी
यह मेरे ही नक्षत्रों का दोष भर रहा

अपनी धुरी पर घूमते
तुम्हारा मेरी धुरी के
क़रीब हो गुज़रना
एक संजोग भर था
मैं उसे आकाशगंगा का
कोई सुनियोजित इशारा
समझ बैठी
मेरे वजूद पर तुम्हारे वजूद की छाया ने
जब बाधित कर दी
मुझ तक पहुँचती हर रोशनी
मैं उस पूर्ण ग्रहण में भी
प्रेम के अहसास भर से
रोशन ही रही।

यह युगों का सच है
जब स्त्री को तोड़ने की
पुरुष की हर कोशिश
विफल हुई
तब पुरुष ने जताया
बेइंतहा प्यार
और फिर
मुहँ मोड़ लिया
इसी सहजता से…
क्यों नहीं बदल पाती स्त्री
क्यों निर्मोही पुरुष से
हर रिश्तें में उसने
मोह का नाता जोड़ लिया!

हिसाब

बादलों ने कब बरसने से पहले
जानी धरती की प्यास
पतंगे ने कब जाना
अपने पूर्वजों का इतिहास

टूटे पल्लव कब कर पाये
पेड़ों से विमोह
उर्वरक बन देते रहे
अनवरत अनुराग

जाल में फँस
फड़फड़ाते पंछी भी
कब कर पाते
दानों पर अविश्वास

यूँ ही तुम्हारे लिए मेरे स्नेह पर
मुझे संदेह कभी नहीं होता
तुम्हारी उस स्नेह के लिए पात्रता
संदिग्ध होने के भी पश्चात

अपने-अपने तौर तरीक़ों से
चुकाए हम ने…
प्रेम-विनिमय में
एक दूजे के हिसाब!

यह भी पढ़ें:

एकता नाहर की कविताएँ ‘पत्नियाँ और प्रेमिकाएँ’
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