कैसी भयानक स्थिति है कि उसकी नंदा को हर्ष ने छीन लिया है और उसे न ग़ुस्सा है, न ईर्ष्या! बस, चुपचाप पराजय की स्वीकृति है। इस पर शायद नंदा को भी दया आती, उसे भी कहीं यही डर था कि दीदी कहीं वैसा ही कुछ तूफ़ान न खड़ा कर दें, जैसा मिस रेमंड के समय किया था। उस दिन तो पता नहीं गीता पर कैसा भूत सवार हो गया था और वह अपने होश-हवास खो बैठी थी! वैसी ही चुनौती वह हर्ष के समय क्यों नहीं अपने भीतर महसूस करती?

नंदा उन दिनों रेमंड से बहुत घनिष्ठ हो गई थी और अक्सर ही साड़ी पहनकर अपने को मुड़-मुड़कर देखती हुई गीता से पूछा करती थी कि, “दीदी, अगर मैं स्कर्ट पहनने लगूँ तो कैसी लगूँ?”

कभी पूछती, “अच्छा, दीदी, ये लम्बे बाल झंझट नहीं होते? कटवा लूँ तो कैसी आसानी हो जाए? लिया और ब्रश करके झट चल दिए।”

गीता रोज़ सुबह उससे तय करती कि—नंदा, जल्दी आ जाना। आज मिस्टर-मिसेज़ विश्वास के साथ खाना खाने जाना है… या—आज चलो, फ़ाइन आर्ट्स एग्ज़ीबीशन में हो आएँ।… या—आज अमुक कॉलेज का उत्सव है… आज तो मन नहीं लग रहा यों ही लेक घूमेंगे या सिनेमा देखने चलेंगे…!

नंदा रोज़ भली लड़की की तरह वायदा कर लेती, “नहीं, दीदी, आज मैं एकदम ठीक टाइम पर आ जाऊँगी। प्रॉमिस, दीदी, रोज़ थोड़े ही…!”

लेकिन रोज़ ही गीता साफ़-सफ़ेद कपड़े पहने, अपने मन के कपड़े नंदा के लिए निकाले इधर-से-उधर घूमती, हर आहट पर खिड़की से झाँक-झाँककर देखती और ग़ुस्से में चीज़ें इधर-से-उधर बिखराती रहती। कभी नौ बजे, कभी दस बजे अपराधी की तरह दबी-सी घंटी बजती या लेच खटर-खटर करता—”दीदी, सच, आज क्या बताऊँ, मिस रेमंड ने ऐसा मजबूर कर दिया कि… बस पीछे ही पड़ गई और पहले न्यू मार्केट में अपने कार्डीगन देखती रही, फिर उन्हें मैलोडी रूम जाना था… फिर ज़रा-सी देर हम लोगों ने क्वालिटी में कॉफ़ी… या—यह रेमंड तो ऐसी पीछे पड़ जाती है कि… ‘डिसने-कार्टून्स’ का आख़िरी दिन था… मेरा तो हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया… तुम होतीं तो तुम भी… लेकिन गीता की अपने-आपको घूरती आँखें देखकर उसकी ज़बान लड़खड़ा जाती और वह चुप हो जाती। करवट बदलकर चुप-चुप रोने लगती तो नंदा ख़ुशामद करती, “तुम्हें मेरी क़सम, दीदी, इस बार माफ़ कर दो!”

फिर दो-एक दिन तक अबोला चलता। एकाध दिन नंदा समय से आती और फिर वही क्रम! गीता ने अपनी बदनामी की चिंता किए बिना उन दिनों अपने यहाँ की मैनेजिंग कमेटी से उसकी नौकरी की बात करनी शुरू कर दी। क्या करे, बी.ए. फ़ेल थी, नहीं तो अपने-आप ही लगा लेती। तब उसकी आँखों के आगे ही रहती। नंदा, अब रोज़ रेमंड के साथ उसके घर जाने लगी थी और उसने डांस सीखना प्रारम्भ कर दिया था। वहीं प्रैक्टिस होती। आते-आते रोज़ नौ-साढ़े नौ बज जाते। रास्ता भी तो लम्बा था। पहले तीन नम्बर बस पकड़कर हाजरा मोड़ जाओ। गीता मिसेज़ कुंती मेहरा से शिकायत करती, “और तो कुछ नहीं है, मुझे यही डर है कि इन किरंटनियों के चक्कर में पड़कर ग़लत रास्ते पर चलने लगेगी। जानती हो, बड़े-बड़े होटलों और डांस की दुनिया उसने अभी तक सिनेमाओं में ही देखी है, बड़ा आकर्षण है, उसकी तरफ़ लपकती है। लड़की ख़ूबसूरत है, बीस लोग चारा डालेंगे। आज यह रेमंड है, कल कोई और होगा। इन स्टेनों, ऑपरेटरों का कोई भरोसा है? मुझे तो डर है, कहीं पीने-पिलाने न लगी हो। अभी ‘स्टेट्समैन’ में आया था, रिपन स्ट्रीट में कोई अंग्रेज़ बुढ़िया यों ही सीधी-सादी लड़कियों को पहले तो ये सारी रंगीनियाँ दिखाकर पीने का चस्का लगा देती, फिर नए-नए ग्राहक फाँसकर धंधा चलाती… अकेली लड़की है, मुझे तो अपनी बेटी जैसी लगती है, इसीलिए…”

लेकिन यह सब कहने की हिम्मत उसकी नंदा से नहीं होती। हाँ, उस दिन रविवार को दोनों में ख़ूब कहा-सुनी हो गई थी। गीता ने साफ़ कह दिया था, “नंदा, हम लोग शरीफ़ मुहल्ले में रहते हैं। यह देर-देर से लौटना, यह दुनिया-भर में भटकना, यहाँ चलना मुश्किल है। मुझे शांति से जीवन बिताने की इच्छा है। तुम्हें भी यहाँ अच्छा नहीं लगता होगा। अच्छा हो, तुम मिस रेमंड के यहाँ ही चली जाओ…”

नंदा ने उद्धत ढंग से ठोड़ी ऊँची करके जवाब दिया, “गीता दीदी, मैं किसी का अहसान नहीं लेती!… रहती हूँ तो खाने-रहने का पैसा देती हूँ। मैं किससे मिलूँ-जुलूँ, यह तय करने का हक़ मेरे पास ही रहने दो!… अच्छा हो, हम लोग अपने-अपने अधिकारों की सीमाएँ समझ लें!”

अवाक्! कॉपियों पर नम्बर देती गीता का हाथ जहाँ-का-तहाँ रुक गया। उसके कान तमतमा आए! वह आँखें फाड़े नंदा को देखती रह गई। नंदा उसी तरह पफ से पाउडर गर्दन और पीठ पर लगाती रही। गीता ने उद्वेग लीलकर कहा, “नंदा, तुम आजकल लिंड्से स्ट्रीट, न्यूमार्केट और पार्क स्ट्रीट की दुनिया की चकाचौंध में हो न, सो, पैसे से हिसाब-किताब करने की बातें कर रही हो। तुम्हें पता है, तुम्हें मैंने इसलिए नहीं रखा था कि इस फ़्लैट का किराया मेरे लिए भारी पड़ता था और तुमसे हिस्सा बँटाना चाहती थी। रखा इसलिए था कि तुम मिसेज़ मेहरा के साथ मिमियाती आयी थीं—दूसरों के यहाँ कब तक पड़ी रहूँ, एक तो वहाँ जगह नहीं है, फिर मुझे लेकर दोनों मियाँ-बीवी में झगड़ा होता है! मैंने भी सोचा था कि सीधी लड़की है, एक कमरे में रह जाएगी! घर पर कोई नहीं है, सो बाहर आकर नौकरी करनी पड़ रही है। कोई घरेलू-सी जगह चाहती है। आज तुम्हारे पर निकल…”

“बहुत-बहुत शुक्रिया, दीदी! जब तक जीऊँगी, तब तक तुम्हारा अहसान मानूँगी! मुसीबत में थी, तुम्हारे पास आ गई थी।” नंदा का गला भर्रा आया था।

छोड़कर जाने को कहने पर रुलाई गीता को भी आने लगी थी। उँगली पर पल्ला लेकर आँखें पोंछती घुटे स्वर में बोली, “मैं तो तेरी ही भलाई के लिए कह रही हूँ, नंदा।”

इस बार शीशे में देखती नंदा व्यंग्य से मुस्करायी—दीदी उसका कहाँ और कितना भला चाहती है, उसे पता है। हुँ, ऐसे ही बंधनों में रहना था तो बिलासपुर से यहाँ आने की ज़रूरत ही क्या थी? भला चाहने के नाम पर ही तो चाची भी…

अगले दिन-भर गीता का मन नहीं लगा। दोनों में नाराज़गी और अबोला, झगड़े बहुत बार हुए हैं, लेकिन रहने की बात को लेकर किसी ने दोनों में से कुछ नहीं कहा कभी। ज़रा-सी देर बाद वह पछताती रही कि उसे इतनी सख़्त बातें नहीं कहनी चाहिए थीं। छोटी और घुटी जगह से आयी है, सो इस नई और खुली ज़िन्दगी का आकर्षण रोक नहीं पाती। थोड़ा भटककर यहीं लौटेगी, जाएगी कहाँ? लेकिन अब तो गीता की समझ में ही नहीं आता कि नंदा अगर इस घर से चली जाए तो वह अकेली रहेगी कैसे? क्यों उसे लौटने की जल्दी होगी, किसके बिखरे कपड़े समेटा करेगी और भुनभुनाते हुए किसके पैसे-क्लिप सम्भालकर रखा करेगी? किसे अनुरोध से बच्चों की तरह मुँह में कौर दे-देकर खिलाएगी और… और सबसे बड़ी बात कि उसके बिना गीता को रात में नींद कैसे आएगी? बिस्तर पर अकेले सोने की कल्पना से ही उसे डर लगता है, अकेले होने की आशंका ही उसका दिल धसका देती है।

उसे लगता रहा कि वह सिर्फ़ अपनी तरफ़ से लोगों से प्यार करती आयी है, दूसरों ने कभी बदले में बराबर का प्यार नहीं दिया। जाने किससे सुना था कि प्यार हमेशा होता ही इकतरफ़ा है। घनिष्ठ और दीर्घजीवी मैत्री या प्यार में दोनों पक्ष कभी एक-दूसरे को समान भाव से प्यार नहीं करते, बल्कि एक व्यक्ति ही करता है। यों, जब मन होता है तो नंदा दिखावा बहुत करती है, लेकिन प्यार कभी भी वह नहीं कर पायी। और उसके लिए गीता अपनी सगी भाभी से लड़ पड़ी। कितनी उम्मीद थी भाभी को कि गीता उनके पिंटू को गोद ले लेगी…

ख़ैर, आज वह नंदा से जाकर माफ़ी माँग लेगी। ग़लती उसकी है, इतनी सख़्त बातें उसे नहीं करनी चाहिए थीं। मन होता था कि सीधी उठकर चली जाए, हालाँकि पता था, नंदा तो साँझ को ही लौटेगी। उसका ऑफ़िस में फ़ोन करने को हाथ उठा, लेकिन फिर याद आ गया कि कल मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग है। उसमें कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाने थे कि सारे दिन सामने कुर्सी पर मिसेज़ दे बैठी-बैठी रिपोर्ट तैयार कराने में मदद करती रहीं और वह ख़ुद ऑडीटर को कभी यह और कभी वह काग़ज़ ला-लाकर देती रही। क्लर्क और मिसेज़ दे के सामने वह नंदा से बातें नहीं करना चाहती थी, यों ही उसे और नंदा को लेकर दुनिया-भर की अफ़वाहें हैं। फिर मिसेज़ दे तो वैसे ही… ऑडीटर तो, ख़ैर, बाहर का आदमी है।… जितनी जल्दी चाहती थी, उतनी ही देर हो गई। स्कूल की बस से ही घर आयी। दस बज रहे थे। उतरकर पागलों की तरह गली में भागी। ऊपर खिड़कियों में अंधेरा था। नंदा होती है तो डर के मारे सारी बत्तियाँ जलाए रखती है। उत्तेजना से काँपते हाथों से ताली लगाकर लेच खोला। स्विच दबाया तो सामने ही ज़मीन पर चिट पड़ी थी— ‘मैं आपकी आज्ञानुसार जा रही हूँ, दीदी। कोई पत्र आए तो नीचे के पते पर रिडाइरेक्ट कर देना। अपने हिसाब के पैसे तनख़्वाह मिलते ही पहुँचा दूँगी।’

नीचे मिस रेमंड का, इक़बालपुर रोड का पता था।

गीता उल्टे पाँव लौट आयी। संकरी जगह में अभी ड्राइवर बस मोड़ रहा था। गीता ने पुकारकर कहा, “सुनो, बिहारीसिंह, रुको! तुम्हें पता है यह इक़बालपुर रोड किधर है?”

एक क्षण सोचकर जब तक बिहारीसिंह ने बताया कि कहीं मोमिनपुर के आस-पास है, तब तक दरवाज़ा खोलकर गीता बस में आ गई, “चलो, रास्ते में किसी से पूछ लेते हैं।”

सामने बिहारीसिंह और गीता को देखा तो नंदा धक-से रह गई। उसे कुछ भी नहीं सूझा। गीता ने बिना किसी भी ओर देखे, सख़्त आवाज़ में पूछा, “तेरा सामान कहाँ है?” फिर एक ओर खड़े सूटकेस और सोफ़े पर रखे बैग इत्यादि की ओर इशारा करके कहा, “बिहारीसिंह, ये सब बस में रख दो!…”

अब तक बाथरूम से कोई और महिला भी बाहर निकल आयी थी और इन तीनों को आश्चर्य से देख रही थी। गीता ने अभयस्त, अधिकार-भरे स्वर में कड़ककर कहा, “नंदा, चलो बस में बैठो! उठो!”

आवाज़ में जाने क्या दुर्निवार था कि नंदा मंत्रबद्ध की तरह आगे-आगे चली आयी। उसे आगे बस में चढ़ाकर गीता बैठी। दूसरी ओर बिहारीसिंह, बीच में नंदा।

सामान रखकर बिहारीसिंह चला गया तो भीतर की चटखनी चढ़ायी और सीधी नंदा के कमरे में आ गई। दोनों हथेलियों में कनपटियाँ लिए बैठी नंदा ने जब तक आहट से सिर उठाया तब तक चप्पल हाथ में लिए गीता उस पर झपट पड़ी थी। इसके बाद गीता पागलों की तरह बकती रही और मारती रही, “तू मेरे पैसों का हिसाब करेगी! मैंने कभी कुछ लिया है तुझसे, हरामज़ादी? तेरे लिए मैंने सारी दुनिया से बदनामी ली… सारे जान-पहचान वालों से लड़ी और तुझे यों चली जाने दूँ? मैं तेरी बोटी-बोटी नहीं नोच लूँगी! मैं मर जाऊँगी तो जहाँ तेरा मन हो, वहाँ चली जाना…”

पहले तो नंदा ने विरोध किया; लेकिन उस उन्मत्त क्रोध के सामने उसके पाँव उखड़ गए। पिटती रही और रो-रोकर प्रार्थना करती रही, “मैं मर जाऊँगी! दीदी! दीदी! तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ।… अब कभी ऐसा नहीं करूँगी!… मुझे माफ़ कर दो, दीदी!”

नंदा कुहनियों से चोट बचाती रही और रोती रही, बिल्कुल छोटी बच्ची की तरह पिटती और रोती रही। जब थककर गीता ने चप्पल एक तरफ़ फेंक दी और धम-से कटे पेड़ की तरह हाँफती हुई ज़मीन पर पड़ गई तो ख़ुद हिचकियाँ ले-लेकर रो रही थी, उसकी बाँहों में नंदा का ढीला शरीर था और वह पागलों की तरह उसका गला, कनपटियाँ, होंठ और बाँहें चूमे जा रही थी, “नंदन! नंदन!… नंदन!… मेरी नंदन!… मुझे माफ़ कर दे, रानी!… मैं तेरे बिना रह नहीं सकती, नंदन! तू जो कहेगी, वही करूँगी! तू जैसे चाहे रह, तू जहाँ चाहे रह, मगर मुझे यों छोड़कर मत जा! तेरे बिना मेरा कौन है ज़िन्दगी में, नंदन, बता? मैं ज़हर खा लूँगी!…”

सारी रात उससे लिपटी गीता माफ़ी माँगती और रोती रही।

उस रात की अपनी विह्वलता और चिरौरियाँ याद करते हुए गीता की आँखों से इस समय भी आँसू ढुलककर गालों पर बह आए। जाने कब वह नंदा के कमरे से आकर फिर खाने की मेज़ पर बैठ गई थी और बंद किताब की जिल्द के अक्षरों पर लिखने की तरह उँगली फिरा रही थी। आधे घंटे और राह देखेगी, नहीं आएँगे तो अंदर से चटखनी लगाकर सो जाएगी। जाएँ भाड़ में दोनों।

उसे डर था कि कहीं उस घटना के बाद दोनों के बीच कोई दीवार न खिंच जाए। लेकिन सुखद आश्चर्य का यह अनुभव उसके लिए नया ही था कि दोनों इसके बाद और भी प्रगाढ़ और अभिन्न हो गई थीं। गीता ने नंदा को पंद्रह दिनों की छुट्टियाँ दिलायीं और दोनों हफ़्ते-भर को पुरी चली गईं।

हर रोज़ सूर्योदय अगले दिन पर टल जाता, क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद सुबह जल्दी आँखें ही नहीं खुलती थीं। हाँ, सारे दिन भटकतीं। दो-तीन दिन जगन्नाथ मंदिर की धुन रही। वहाँ की मूर्तियाँ देख-देखकर दोनों गूढ़ संकेत से एक-दूसरी की ओर मुस्करातीं। या फिर पानी के बिल्कुल पास-पास, समुद्र के किनारे-किनारे रेत में, दोनों हाथ-में-हाथ पकड़े दूर तक भटकती रहतीं, चप्पलें हाथों में ले लेतीं और पिंडलियों पर लहरों की गुदगुदाहट का रोमांच मुक्त खिलखिलाहटों में किलकार उठता, “अरे दीदी, मुझे पकड़ो!”

देर तक रेती में लेटी रहतीं। उस घटना का ज़िक्र दोनों में से जान-बूझकर किसी ने नहीं किया, दोनों उसे भूल गई थीं।

उस दिन नौ बजे की सुनसान चांदनी थी और दोनों अपने होटल के सामने ही लहरों से ज़रा हटकर कुहनियों के बल औंधी लेटी, मुट्ठियों में रेत भर-भरकर पानी की धार की तरह छोड़ रही थीं! लहरों की झागदार तहें, बालू पर सफ़ेद झाग लीपती लौट जातीं और सागर में कभी यहाँ और कभी वहाँ एक छहराहट के साथ, पानी के पहाड़ टकराकर बिखर जाते। बार-बार गीता का चश्मा गीली-गीली फहारों से धुंधलाकर चिपचिपा हो उठता था। सागर की गरज एक अजस्र उन्माद तन-मन को जगा रही थी।

बड़ी देर की चुप्पी के बाद गीता ने लाड़ से पूछा, “तेरी चाची तुझे बहुत मारती थी न, नंदन?”

“हाँ, तुम्हें कैसे मालूम?” नंदा ने अनमने भाव से गहरी साँस ली।

“यों ही”, फिर गीता चित लेट गई। आसमान को ताकते हुए बहुत स्वाभाविक ढंग से बोली, “उस दिन तेरे मुँह से कई बार निकला था— चाची तेरे हाथ जोड़ूँ, अब नहीं करूँगी।”

नंदा के गालों पर आँसू ढुलक आए। बड़ी देर होंठ फड़कते रहे, फिर उद्वेग लीलकर बोली, “मैंने बहुत दुःख देखा है, गीता दीदी। सौतेली माँ के व्यवहार से बचाने के लिए बाबू जी ने चाचा जी के यहाँ भेज दिया था। सो, वहाँ…” उसने फिर एक गहरी साँस ली।

रोती नंदा को खींचकर गीता ने उसका सिर छाती पर रख लिया और देर तक उसकी कनपटी सहलाती रही। ख़ुद उसकी आँखों से भी आँसू गिरते रहे।

“छाती पर जो दाग़ है न, जिसे मैं फोड़ा बताती हूँ, वह चाची का ही दिया हुआ है। मैंने सोचा था कि हर्ष के साथ कहीं चली जाऊँगी, या यों ही कहीं भी जहाँ मन होगा निकल जाऊँगी। मैंने शायद यह बात चचेरी बहन से कह दी, उसने अपनी माँ से जा पिरोया और उसके बाद तो, दीदी, बस यही समझो कि हफ़्ता-भर पड़ी-पड़ी कराहती रही। गरम कलछी से निशान बना दिया—ला, तेरी जवानी निकालूँ!”

गीता का सहलाता हाथ उसे धीरज बंधाता रहा और वह रुक-रुककर कहती रही, “तुम्हें नहीं लगता, दीदी, कि कुछ लोग शुरू से ही क़िस्मत में दुःख लिखाकर लाते हैं?… उनके लिए अतीत और भविष्य में एक सुनसान अंधियारे के सिवा कुछ नहीं होता और उन्हें ज़िन्दगी में कुछ भी नहीं मिलता।”

तब गीता को लगा कि यह उसकी छाती पर सिर रखे नंदा नहीं, स्वयं उसके भीतर से कोई बोल रहा है। नंदा बताए जा रही थी, “कॉलेज में ये मुझसे दो क्लास आगे थे। एक ड्रामे में हम दोनों में साथ-साथ परिचय हो गया। फिर मित्रता गहरी होती चली गई। हर्ष ने मुझे पहले ही बता दिया था कि उनकी शादी हो चुकी है और एम. कॉम. के बाद, बाक़ी रस्में हो जाएँगी। लेकिन जाने कैसा पागलपन था—मैंने कहा, मैं तुम्हें शादी के लिए नहीं प्यार करती!… अब तो उनके एक बच्चा भी है, लेकिन मुझे लगता ही नहीं है, दीदी, कि हर्ष मेरा नहीं है।”

गीता ने मन-ही-मन कहा—इसीलिए तो तू मिस रेमंड के साथ चली गई थी न, हर्ष के साथ उसके प्यार को बहुत बार सुन चुकी थी, और जानती थी कि नंदा के पास किसी एच. खन्ना के पत्र आते हैं। जब भी वह नंदा के प्रति एक आप्लावनकारी प्यार अनुभव करती, साँप की जीभ जैसी एक आशंका लपलपाया करती—कहीं एक हर्ष है जो उसकी नंदा को उससे छीन ले जाएगा। हर्ष के प्रति नंदा की प्यार-भरी बातें सुनकर वह गहराई में बहुत उदास हो आती थी, लेकिन आज सागर के इस सीले वातावरण में उसे नंदा के प्यार में सचमुच कुछ उदात्त और गम्भीर लग रहा था।

नंदा कह रही थी, “आज वह दिल्ली के किसी बैंक में हैं।… लेकिन लंदन में भी रहें तो भी मुझे नहीं लगता कि मैं उनसे कहीं दूर रह रही हूँ।… मैं तुमसे सच कह रही हूँ, दीदी, वहाँ हर्ष और यहाँ तुम न होतीं, तो शायद… शायद मैं मिट्टी का तेल छिड़ककर…”

तब गीता ने उसके मुँह पर हाथ रखकर उसे रोक दिया। भीतर यह भी लगता रहा कि ये सब बातें चाहे दिखावटी नहीं, लेकिन उनमें क्षणिक भावुकता तो है ही। फिर भी वह भीग उठी, “ऐसा क्यों बोलती है, नंदन? तूने मुझे बचा लिया है। वरना पता नहीं… पता नहीं…”

घूँट-घूँट सटककर वह फिर कहने लगी, “जान-पहचान और परिवार में जिनके भी कोई छोटा-बड़ा बच्चा है, सभी सोचते थे कि मैं उसे गोद ले लूँगी और अपना सारा प्रोविडेंट फ़ंड और इंश्योरेंस उसके नाम कर जाऊँगी।… मैं इस स्वार्थी पैंतरेबाज़ी से तंग आ चुकी थी, नंदन!… अब तो तेरे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता।… मेरा अपना है ही कौन? एक भाई था, आज पागलख़ाने में पड़ा है।… बहुत बड़े अफ़सर बाप की बेटी थी, सो ट्यूटर को पापा ने बोरे में बंद करके नौकरों से पिटवाया था, और मैं कमरे में बंद सिर्फ़ किवाड़ पीटती रही थी। उसकी घुटी-घुटी आवाज़ आज कभी-कभी सुनायी देती है कि—गीता, मैं तुम्हें लेने आऊँगा… मेरी राह देखना… और उसी के प्रतिरोधस्वरूप कभी बाप का कहना नहीं माना। बस, पढ़ती रही, पढ़ती रही और राह देखती रही… और तो अब लगता है कि राह देखना मेरा स्वभाव बन गया है।… मुझे लगता ही नहीं है कि वह नहीं है और उसकी राह देखना बेकार है।… नहीं, प्यार-व्यार की भावुकता की बातें नहीं हैं। सच बात तो यह है कि राह देख-देखकर जब ऊब गई तो पाया कि ज़िन्दगी मुझे छोड़कर बहुत आगे बढ़ गई है, और मेरा सारा उत्साह ही चुक गया है!… पैंतीस की हो गई तो लगने लगा कि शायद फिर से राह देखने लगी हूँ, लेकिन किसकी राह देखने लगी हूँ, यह पता नहीं है।… आजकल कभी-कभी लगता है कि शायद तेरी ही।”

चश्मा उतारकर रेत पर रखा और आँखों पर बाँह रखकर फूट-फूटकर रोने लगी। हिचकियों में ही बोली, “अब तो उम्र हो गई है, नंदन। मेरी तो बेटी, प्रिया, बंधु, स्वामी जो कुछ भी है, सो तू ही है।… किसी दिन मर जाऊँ तो सब कुछ लेकर बस जाना कहीं अपने हर्ष के साथ।” आत्म-करुणा के आँसू उसकी आँखों से बहते रहे, “सभी कुछ तेरा है।”

“दीदी, ऐसा मत कहो, दीदी!” नंदा और ऊपर सरक आयी और बार-बार गीता के होंठ, पलकें और कान की लबों को अपने होंठों से छूती रही। चांदनी में आँसुओं से चमकते गालों और बंद पलकों को देखकर एक पल को उसे लगा कि शायद मर जाने पर गीता ऐसी ही लगेगी। विचार को बलात् पीछे धकेल वह कहती रही, “मैं कहीं नहीं जाऊँगी, दीदी…”

सागर में ज्वार आने लगा था और लहरें अब रेत पर और आगे-आगे सरकती आ रही थीं। एक बड़ी-सी लहर का पानी जब अपनी सीमा से लुढ़कता-लुढ़कता इनके नीचे तक की रेत को भिगोता आगे निकल गया, तो कपड़े झाड़ती दोनों उठ खड़ी हुईं।

उस रात नंदा के निर्वस्त्र, समर्पित शरीर को अपनी उत्तेजित साँसों और उन्मत्त बाँहों में जकड़े, उसके दाहिने वक्ष के रुपये के बराबर दाग़ पर होंठ रखे, गीता पागलों की तरह बस यही कहती रही, “नंदन, मुझे छोड़कर मत जाना!… मैं तेरे बिना मर जाऊँगी, नंदन!”

बाद में मन का पाप-बोध भले ही ग्लानि और आत्म-भर्त्सना बनकर चूहों की तरह आत्मा को कुतरता रहे, लेकिन उस क्षण न गीता को होश रहता और न नंदा को। नंदा तो ऐसी पागल हो जाती है कि नोचने-काटने लगती है।

रात को जब भी नंदा की नींद खुली, उसने पाया—गीता, तकिए पर फैले उसके केशों, कंधों और पीठ पर हाथ फेर रही है, या शायद इसी से उसकी आँखें खुल जाती थीं। देर तक वह यों ही पड़ी, निश्चेष्ट छत ताकती रहती और बाहर सागर गरजता रहता। फिर धीरे-धीरे नींद आ जाती। सुबह अंधेरा छँटने से पहले फिर उसकी आँखें खुलीं। उसने अलसाकर गीता से लिपटते हुए पूछा, “तुम्हें नींद नहीं आयी न आज रात-भर, दीदी?”

“पता नहीं क्या हो गया है… बस, मन करता है तुझे यों ही लिटाए रहूँ और तुझे देखती तेरे केशों, गालों को छूती रहूँ… लगता है कि कोई तुझे मुझसे छीन लेगा!”

नंदा ने कुछ नहीं कहा। हल्की ऊब जागी। फिर कुछ सोचती-सी बोली, “तुम्हें एक बात पता है, दीदी?”

“क्या, नंदन?” जैसे हर बार ‘नंदन’ नाम के उच्चारण से वह अपना प्यार उस पर उंडेल देना चाहती थी।

“मुझे एक बार मिसेज़ मेहरा ने बताया था”, नंदा कहने लगी, “तुम्हारे कॉलेज में आजकल एक चर्चा बहुत ज़ोर पकड़ रही है कि… कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ।”

“सो तो है ही!” दुलार-भरे स्वर में गीता ने कहा।

“उँह, यों नहीं! यों कि, तुम किसी को प्यार करती थीं, मैं उसी की निशानी हूँ। पहले तुम मुझे कहीं होस्टल में रखकर पढ़ाती रहीं और अब बुला लिया है। बहुत जल्दी कहीं-न-कहीं अपने कॉलेज में लेने की फ़िराक़ में हो…” नंदा उसकी हर प्रतिक्रिया को भाँपती बोलती रही।

“मुझे पता है”, गीता ने गहरी साँस ली, “इसीलिए तो तुझे अभी तक कॉलेज में नहीं बुलाया न, वरना तुझे एक दिन भी उस फ़र्म में टाइपिस्ट का काम करने देती? वह कोई भले आदमियों की जगह है?”

नंदा फिर अपनी बात पर लौट आयी, “यह बात सच है, दीदी?”

दर्द से हँसी गीता, “सच होती तो तुझे पता नहीं होता? तुझसे कुछ छिपाया है?” गीता भावुक हो उठी, “हाँ, सच होती तो मेरी लड़की होती तेरे ही बराबर… या तीन-चार साल छोटी होती… हम लोग आख़िरी बार मिले थे उन्तालीस में। उसी साल लड़ाई शुरू हो गई थी।… समझ ले, लड़की बीस-बाईस साल की हो गई होती।…” और सहसा ही जब गीता ने दूसरी ओर करवट बदल ली तो उसे लगा, जैसे गीता सुबक रही है। वह उसकी पीठ पर लदकर कंधे से उसे अपनी ओर मोड़ती बोली, “गीता दी!… दीदी! देखो, दीदी! मेरी क़सम है तुम्हें!”

“मुझे अच्छा नहीं लगता, नंदा।… मुझे वो सब बातें याद आती हैं तो बहुत बुरा लगता है!…” गीता रोती रही।

“मैं तो हूँ, दीदी, तुम्हारी बेटी, तुम्हारी छोटी बहन, तुम्हारी… नंदन!” नंदा बड़ी बहन और माँ की तरह गीता को समझाती रही, और उसे ऐसा लगता रहा कि कहीं ख़ुद उसका भविष्य भी तो ऐसा ही होने नहीं जा रहा है? मुँह से वह बोलती रही, “दीदी, मैं तुम्हें छोड़कर कभी… कभी नहीं जाऊँगी!”