रंगपथ से परे रंग

‘Rangpath Se Pare Rang’, a poem by Dharmpal Mahendra Jain

बंद आँखों के भीतर
घने अंधेरे में
जब तुम आती हो
बहुत सारे रंग आते हैं तुम्हारे साथ
ख़ुशमिज़ाज
इंद्रधनुष को तुममें बदलते हुए।

सुनहरी किरणें दस्तक देती हैं
कपास का श्वेत फूल प्रस्फुटित होता है
वह जो नीला वलय बन रहा था तुम्हारे हाथों से
तुम्हारे जामुनी होंठों में बदल जाता है
मैं तुम्हें ढूँढने लगता हूँ
वहाँ तो चमकती हँसी होती है।

आहिस्ता-आहिस्ता
आसमानी रंग चमकदार होने लगता है
ऐसा कि सैकड़ों सूरज
एक साथ जगमगाये हों
भूरी पलकों के भीतर मुस्कुराती हैं तुम्हारी आँखें
विचार की तरह आती हो तुम सहज
और व्याकरण बनने लगती हो धीरे-धीरे।

कितने सारे रंग हैं तुम्हारे!
मैं एक रंग समझने की कोशिश करता हूँ
और नये रंग भर आते हैं
रंगपथ से परे रंग
जो पहले देखे नहीं मैंने कभी।

बंद आँखों से तारों में खोजता हूँ तुम्हें
नारंगी धरती को ढाँप लेता है कोई कत्थई ग्रह
चाँदनी के साये में तुम उतरती हो तो
साँस लौटती है वापस
तुम पर सब रंग फ़बते हैं।

घने काले बादल घिर आते हैं
बिजली-सी कौंधती हो तुम
और खो जाती हो
कहाँ से आती हो तुम आँखों के भीतर और
सुलाकर भाग जाती हो।

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