Poems: Shariq Kaifi

रोता हुआ बकरा

वही बकरा
मिरा मरयल सा बकरा
जिसे बब्लू के बकरे ने बहुत मारा था वो बकरा
वो कल फिर ख़्वाब में आया था मेरे
दहाड़ें मार कर रोता हुआ
और नींद से उठ कर हमेशा की तरह रोने लगा मैं
ख़ता मेरी थी
मैंने ही लड़ाया था उसे बब्लू के बकरे से
उसे मालूम था पिटना है उस को
मगर फिर भी वो उस मोटे से जा कर भिड़ गया था
मिरी इज़्ज़त की ख़ातिर
वो भी कुर्बानी से कुछ देर पहले
मगर पापा तो कहते हैं वो जन्नत में बहुत आराम से होगा
वहाँ अंगूर खा कर ख़ूब मोटा हो गया होगा
तो क्यों रोता है वो ख़्वाबों में आ कर
वो क्यों रोता है आ कर ख़्वाब में ये तो नहीं मालूम मुझ को
मुझे तो ये पता है
वो जब जब ख़्वाब में रोता हुआ आया है मेरे
तो अगले रोज़ बब्लू को बहुत मारा है मैंने।

बात फांसी के दिन की नहीं

ऑक्सीजन की टियूब
और फांसी के फंदे में वैसे भी क्या फ़र्क़ है
बात फांसी या फांसी के दिन की नहीं
मौत की भी नहीं
बात तो लाश के मज़्हका-ख़ेज़ लगने की है
फ़िक्र लाशे की है
जाने कैसी लगे
एक फुट लम्बी पतली सी गर्दन
मिरे इतने भारी बदन पर
और ज़बाँ
वो जो सुनते हैं इतनी निकल आएगी मुंह के बाहर
काली माई की सूरत
कहीं वो डरा तो नहीं देगी बच्चों को मेरे
और वो सब नेक इन्सान जो ग़ुस्ल देंगे मिरे जिस्म को
सो भी पाएँगे क्या चैन से
या मिरा भूत उन को डराता रहेगा महीनों तलक
मैं नहीं चाहता कोई मुझ से डरे
कोई मुझ पर हंसे
ज़िन्दगी इक लतीफे की सूरत कटी, कुछ शिकायत नहीं
हाँ मगर
लाश की शक्ल में मज़्हका-ख़ेज़ लगने से डरता हूँ मैं
बात इतनी सी है
बात फांसी या फांसी के दिन की नहीं।

मरने वाले से जलन

ज़रा सा ग़म नहीं चेहरे पे उन के
मियाँ सर पर कोई रुमाल ही रख लो
इन्हें तो मौत आना ही नहीं है
वही ताने
वही फ़िक़रे
अभी तक मेरा पीछा कर रहे हैं हर जनाज़े में
मैं अपनी चाल की रफ़्तार थोड़ी और कम कर के
निकल आता हूँ बाहर भीड़ से
और रुक के इक दुकान पर सिग्रेट जलाता हूँ
जनाज़ा दूर होता जा रहा है
ये सब क्या है?
अदाकारी नहीं आती मुझे तो क्या करूँ मैं
और सच्ची बात कह दूँ तो मुझे पागल समझ लेगी ये दुनिया
हाँ ये सच है
मुझे रत्ती बराबर ग़म नहीं होता किसी की मौत का
और ये भी सुन लो
मिरी जिस मुस्कुराहट पर यहाँ नाराज़ हैं सब
सबब उस का जलन है
जो मैं महसूस करता हूँ किसी भी मरने वाले से
कुढ़न होती है मुझ को सोच कर
कि मैं जिस इम्तिहाँ के ख़ौफ़ से बेहाल और बेचैन फिरता हूँ
वो ये साहब
जो काँधों पर हैं
उन का हो चुका
और मेरा बाक़ी है।

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शारिक़ कैफ़ी
शारिक़ कैफ़ी उर्दू के प्रतिष्ठित शायर हैं, जिनका जन्म बरेली में 1 जून, 1961 में हुआ। इनके शायरी के चार संग्रह 'आम सा रद्द-ए-अमल', 'यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी', 'अपने तमाशे का टिकट' व 'खिड़की तो मैंने खोल ही ली' आ चुके हैं और शीघ्र ही नयी किताब 'क़ब्रिस्तान के नल पर' आने वाली है।

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