Tag: स्त्री
ब्रह्म-मुहूर्त
एक वे थीं कि जाग रहीं सदियों से
उनकी नींदों में घुला था तारा भोर का
आद्रा नक्षत्र की बाँह थामे
दिन आरम्भ होता उनके अभ्यस्त हाथों से
फिर...
नदी और स्त्री
स्त्री होना
या
होना नदी!
क्या फ़र्क़ पड़ता है?
दोनों ही उठतीं, गिरतीं
बहतीं, रुकतीं
एक बदलती धारा
एक बदलती नियति।
एक सोच
एक धार
मिल जाती है
किसी न किसी
सागर से
और हो जाती है
एकाकार
सागर में
अपने...
सच्ची कविता के लिए
वह जो अपने ही माँस की टोकरी
सिर पर उठाए जा रही है
और वह जो पिटने के बाद ही
खुल पाती है अन्धकार की तरफ़
एक दरवाज़े-सी
जैसे...
लोग कहते हैं
लोग कहते हैं
मैं अपना ग़ुस्सा कम करूँ
समझदार औरतों की तरह सहूँ और चुप रहूँ।
ग़ुस्सा कैसे कम किया जाता है?
क्या यह चाट के ऊपर पड़ने...
और मत रखो अँधेरे में, देखने दो मुझे
मेरी इच्छा है कि सुबह से दोपहर, दोपहर से रात तक अकेली घूमती रहूँ। नदी के किनारे, गाँव के मैदान में, रोशनी में, शहर...
माया एंजेलो की कविता ‘मैं फिर भी उठती हूँ’
तुम मेरा इतिहास लिख सकते हो
अपने कड़वे, मुड़े-तुड़े झूठों से
तुम मुझे गंदगी में कुचल सकते हो
फिर भी, धूल की तरह, मैं उठूँगी।
क्या मेरी उन्मुक्तता...
माया एंजेलो की कविता ‘उदित हूँ मैं’
माया एंजेलो की कविता 'And Still I Rise' का अनुवाद
कड़वे छली मृषा से इतिहास में तुम्हारे
तुम्हारी लेखनी से मैं न्यूनतम दिखूँगी
धूल-धूसरित भी कर सकते...
बहनें
कोयला हो चुकी हैं हम बहनों ने कहा रेत में धँसते हुए
ढक दो अब हमें चाहे हम रुकती हैं यहाँ तुम जाओ
बहनें दिन को...
बैठी हैं औरतें विलाप में
बैठी हैं एक साथ
गठरी बन
बिसूरतीं
रोतीं, विलाप करतीं स्त्रियाँ
करतीं शापित पूरे इतिहास को
जिसमें उनके लिए
अंधकार का मरुस्थल बिछा है
बैठी हैं याद करतीं
अपनी महान परम्परा को
जिसमें थी...
सीलमपुर की लड़कियाँ
सीलमपुर की लड़कियाँ 'विटी' हो गईं
लेकिन इससे पहले वे बूढ़ी हुई थीं
जन्म से लेकर पन्द्रह साल की उम्र तक
उन्होंने सारा परिश्रम बूढ़ा होने के...
भीख और स्नेह का फ़र्क़
हमने प्यार, दया का
भीख और स्नेह का फ़र्क़ जाना
नदियाँ खंगालीं, जंगल बुहारा।
पीठ पर फिराए गए हाथों का
शाबाशी और लिजलिजाहट का भेद जाना।
हमने समन्दर की गहराइयों...
अब मैं औरत हूँ
मेरे आक़ा
खिड़कियों के सुनहरे शीशे
अब काले पड़ चुके हैं
उधर मेरा रेशमी लिबास
तार-तार
कमरबन्द के चमकीले गोटे में
पड़ चुकी फफून्द
तुम्हारे दिए चाबुक के निशान
मेरी पीठ से...











