Tag: Kushagra Adwaita

Kushagra Adwaita

हम खो जाएँगे

मैं और तुम, तुम और मैं, यानी हम दोनों एक दिन खो जाएँगेठीक वैसे, जैसे खो जाते हैं मेरे सारे सवाल, तुम्हारे सारे जवाब दो चार होने पर, जैसे खो जाते...

ओ! कश्मीरी बाला

ओ! कश्मीरी बाला झेलम की अविरल धारा डल में धड़कती शिकारा ओ! कश्मीरी बालारुख़ पै रोशन केसरी लाली मुस्काँ बिखेरती चारों तरफ़ पर्वत की बिटिया हो तुम आवाज़ में है...
Red Flower

सारी सृष्टि प्रेम में है

ब्रैड पिट और एंजेलिना जॉली ही नहीं बेहद ही साधारण, बेहद सामान्य लोग, जिनके इर्द-गिर्द नहीं घूमती दुनिया, जिनको कोई नहीं जानता, सारे उपक्रम करने के बावजूद जिनकी तरफ़ कोई मुड़कर...

हक़ की बात

कोई भी सबके हक़ के बाबत कैसे बोल सकता है?जंगलों के हक़ माँगने वाले स्वतः भूल जाते हैं― ईमारतों के हक़, रोज़गार और मौक़ों की ख़ातिर अपने शहरों...

अपराजिता के चार फूल

तुम्हारा कम्बल नीला, तकिये नीले, पर्दे-वर्दे भी सब नीले, बुकशेल्फ़ नीला, स्वेटर नीला, मफ़लर नीला, अलमारी नीली चप्पल नीलीऔर, अब तो तुमने मनमानी करके ले लिए हैं जूते भी नीले हीअब सब कुछ जब नीला ही था तो, क्या ज़रूरत थी दीवारों पर नीले...
Kushagra Adwaita

तुम्हारी एक तस्वीर लेनी है

तुम्हारी एक तस्वीर लेनी है, फ़ेसबुक पर पोस्ट करनी है, कैप्शन देना है― तितली।तुम्हारी एक तस्वीर लेनी है जिसमें बख़ूबी कैद हो तुम्हारी स्वप्निल आँखों का उर्मिल नीलापन कैप्शन देना है― मछली।तुम्हारी...

बुकमार्क

जब लश्कर-ए-आफ़ताब जाने लगे, शब दहलीज़ पर आ दरवाज़ा खटखटाने लगे, तब जहाँ रंगीनियाँ नाचने-गाने लगें मजनुओं की इबादतगाह तुम शहर का वो हसीन पार्क हो, तुम मेरी महबूब...
Raat

रात

माँ रोती रही सारी रातदिन जैसी ही दीप्त, शरद की, पूनम की, बाँवरी रातसहलाती रही माँ का सिर, मुलायम-सी, ममतामयी रातबेसुध हो सोते रहे तातरोता रहा समूचा गगन, कुँवारा चाँद, तकिया, कम्बल, मनहूस खाटऔर, माँ...!
Kushagra Adwaita

कविताओं का मूड स्विंग बहुत होता है

कल रात स्वप्न में कविताएँ आईं, उदास थीं, थकी हुई और थोड़ी बेचैन भी, कहने लगीं ― अब उनका पता बदल गया है, अब वे काव्य गोष्ठियों...
Kushagra Adwaita

यह तुम पर लिखी अंतिम कविता है

यह तुम पर लिखी अंतिम कविता है यह तुम्हारा अंतिम परिचय है**तुम एक गीत हो अपशकुन लाने वाला गीतऐसी मान्यता है ~ तुम्हें गाने वालों पर होता...
Kushagra Adwaita

प्यार मत करना

जिस शहर में पुश्तैनी मकान हो बाप की दुकान हो गुज़रा हो बचपन हुए तुम जवान हो उस शहर में प्यार मत करनाजिस शहर से ले जानी पड़े बारात बाँधनी पड़े पगड़ी करनी...
Kushagra Adwaita

तीन कविताएँ

मेरे अंदर एक पागलखाना है मेरे अंदर एक पागलखाना है तरह-तरह के पागल हैंएक पागल हरदम बोलता ही रहता है, दूसरा पागल ख़ामोशी ओढ़े है बस नींद में...

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