Tag: Rupam Mishra
स्त्रियों, चलो कहीं और चलें
'Striyon Chalo Kahin Aur Chalein', a poem by Rupam Mishra
ये शयनकक्ष से संसद तक काँटेदार हँकना लेकर खड़े हैं
जो हमारे ज़रा से इंकार पर...
तुम मेरे अपराधी हो
'Tum Mere Apradhi Ho', a poem by Rupam Mishra
मैंने अपराधी के सीने से लगकर उसके अपराध कहे
और हृदय से सुना हृदय का अपराधबोध
और जाना...
मैं शर्मिंदा हूँ
'Main Sharminda Hoon', a poem by Rupam Mishra
तुम नहीं समझ पाओगे!
पराई चोटों को मोबाइल स्क्रीन पर देखकर
तड़पकर कलेजा मुँह को आ जाना,
बैचैन होकर रात...
नदी और सागर
'Nadi Aur Sagar', a poem by Rupam Mishra
एक दिन शरद की सुहानी-सी रात थी
प्रकृति ने ज्योत्स्ना के साथ जैसे
प्रणय भी बिखेर दिया था वातावरण...
चीख़ किस नस्ल की है
'Cheekh Kis Nasl Ki Hai', a poem by Rupam Mishra
जो कवि लिख सकता था जन-सम्बन्धों की श्रेष्ठ कविताएँ
वो आजकल कुण्ठा लिख रहा है
जिसने कभी...
प्रेम की पीड़ा
'Prem Ki Peeda', a poem by Rupam Mishra
एक दिन तुम्हें आख़िरी ख़त लिखूँगी,
कभी अवसान हो तो उसका जबाब देना
जिससे मृत्युशय्या पर मेरी पीड़ा कम...
काश, तुम युवा नहीं होते
'Kaash Tum Yuva Nahi Hote', a poem by Rupam Mishra
प्रेम हमें कितनी श्रेष्ठतम आत्मिक
अवस्था में पहुँचा देता है!
इसकी थाह मुझे तब मिली जब
तुम्हारी आँखों...
सेफ़ ज़ोन
'Safe Zone', a poem by Rupam Mishra
प्रेम में हारी स्त्रियाँ धीरे-धीरे प्रबुद्ध होती जाती हैं
क्योंकि दिन-रात वे भटकती रहती हैं
किताबों और ग्रन्थों में
ये हँसती, निभाती...
दोहन
'Dohan', a poem by Rupam Mishra
काफ़ी देर से वो मेरे आँगन की देहरी पर
चुपचाप बैठी थी
जन्म की शज़री आँखें अब एकदम सूनी हैं
मैंने पूछा...
तुम इतने ख़ूबसूरत हो
'Tum Itne Khoobsurat Ho', a poem by Rupam Mishra
तुम इतने ख़ूबसूरत हो कि
कविता लिखने बैठती हूँ तो
शब्द हार जाते हैं
तुम इतने ज़हीन हो
ख़यालों में...
आख़िर स्त्रियों को कितना सहना चाहिए
एक दिन मैं बारी-बारी से
उन सारी जीवट और
कर्मठ स्त्रियों पर कविता लिखूँगी
जो एकदम नमक की तरह होती हैं
खारेपन से बनी होती है उनकी देह
कविता...
तुम्हारे साथ मुझे बँधना है, वो बँधन चाहे जैसा हो
'Tumhare Sath Mujhe Bandhna Hai', Hindi Patr by Rupam Mishra
तुम आंशिक रूप से घुल गये हो मेरे व्यक्तित्व में! तुम्हारा श्रेष्ठ चरित्र हमेशा मेरे...









