तुम ढूँढ लेती थीं जाने कैसे
हर छोटी-छोटी चीज़ में ख़ुशी,
उदासियों को बंद कर दिया था तुमने
अपनी रसोई में माचिस के एक डिब्बे में
और जलाते हुए हर बार चूल्हा
कर देती थी उन्हें चुपके से स्वाहा

हमारे स्वादों को भर के डिब्बों में
लगाती थीं ढक्कन बड़े ही जतन से
कि लगने न पाए फफूँद किसी भी क़ीमत पर
और हम चाटते हुए उँगलियाँ देख ही नहीं पाए
आग की तपिश में झुलसा
तुम्हारा तम्बाई रंग

तुम्हारा सब कुछ हमारा था
ईश्वर पर एकाधिकार के जैसे
जिसमें नहीं थी जगह स्वयं तुम्हारे लिए भी,
दरअसल तुमने रखा ही नहीं
कोई भी कोना बचाकर अपने लिए

तार पर सूखते कपड़ों में
स्कूल के बस्तों में
खाने की थालियों में
क़रीने से लगी अलमारियों में
टाई-बेल्ट, यहाँ तक कि हमारे रुमालों में
तुमने बसा लिया था ख़ुद को,
और महकते हुए जीवन में
हम देख ही नहीं पाए तुम्हारे पैरों की
फटी बिवाइयाँ

हमारे सारे सुख
हमारे सारे सपने
टिके हुए थे
तुम्हारे ही पाँव पर
अम्मा…

सीमा सिंह की कविता 'दाह'

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