सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता जवाँ होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया पर्दा हया यकलख़्त...

वो जो रूठें यूँ मनाना चाहिए

वो जो रूठें यूँ मनाना चाहिए ज़िंदगी से रूठ जाना चाहिए हिम्मत-ए-क़ातिल बढ़ाना चाहिए ज़ेर-ए-ख़ंजर मुस्कुराना चाहिए ज़िंदगी है नाम जोहद ओ जंग का मौत क्या है भूल जाना...

हवाओं की सदाएँ सुन सके तो सुन ज़रा ज़ालिम,

हवाओं की सदाएँ सुन सके तो सुन ज़रा ज़ालिम, है तुझमें ज़ोर तो आकर के मुझपे आज़मा ज़ालिम। ये तेरी जुर्रतें मुझको बड़ी बेबस सी लगती हैं, ख़ुदा...

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है

ये बात-बात में क्या नाज़ुकी निकलती है दबी-दबी तिरे लब से हँसी निकलती है ठहर-ठहर के जला दिल को, एक बार न फूँक कि इसमें बू-ए-मोहब्बत अभी...

दुनिया में हर चीज की कीमत होती है

मुर्दों की भी एक वसीयत होती है दुनिया में हर चीज की कीमत होती है। इंसान तो क्या भगवान खरीदे जाते हैं तभी तो सबसे ऊपर दौलत...

वो चुप हो गए मुझसे क्या कहते-कहते

वो चुप हो गए मुझसे क्या कहते-कहते कि दिल रह गया मुद्दआ कहते-कहते मेरा इश्क़ भी ख़ुदग़रज़ हो चला है तेरे हुस्न को बेवफ़ा कहते-कहते शब-ए-ग़म किस आराम...

आइए मरुभूमि में उद्यान की चर्चा करें

आइए मरुभूमि में उद्यान की चर्चा करें, ध्वंस के सन्दर्भ में निर्माण की चर्चा करें। निर्झरों, नदियों, तड़ागों की प्रगति को साधुवाद, सिंधु में उठते हुए तूफ़ान...

जानवर भी अब सहमे-सहमे से रहते हैं

जानवर भी अब सहमे-सहमे से रहते हैं, सुना है कि यहाँ इंसानों की बस्ती है। ज़िन्दगी का हर मोड़ एक प्रश्न है, चाहे जितनी ले लो, मौत...

उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे

उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे दिल थाम के बैठे थे, जिगर थाम के उठ्ठे दम भर मिरे पहलू में उन्हें चैन कहाँ...

आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाई

आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाई रह जाऊँ सुन न क्यूँकर ये तो बुरी सुनाई मजनूँ ओ कोहकन के सुनते थे यार...

कुछ लाग कुछ लगाव मोहब्बत में चाहिए

कुछ लाग कुछ लगाव मोहब्बत में चाहिए दोनों तरह का रंग तबीअत में चाहिए ये क्या कि बुत बने हुए बैठे हो बज़्म में कुछ बे-तकल्लुफ़ी भी...

ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई

ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई हम को अपनी तीरा-रोज़ी की हक़ीक़त खुल गई क्या तमाशा है रग-ए-लैला में डूबा नीश्तर फ़स्द-ए-मजनूँ बाइस-ए-जोश-ए-मोहब्बत खुल...
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