मेरी आँखों की पुतली में
तू बनकर प्रान समा जा रे!

जिससे कण-कण में स्पंदन हों
मन में मलायानिल चंदन हों
करुणा का नव अभिनन्दन हों
वह जीवन गीत सुना जा रे!

खिंच जाय अधर पर वह रेखा
जिसमें अंकित हों मधु लेखा
जिसको यह विश्व करे देखा
वह स्मिति का चित्र बना जा रे!

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जयशंकर प्रसाद
जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1890 - 15 नवम्बर 1937), हिन्दी कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया।

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