रवीश कुमार की किताब ‘बोलना ही है’ से उद्धरण | Quotes from ‘Bolna Hi Hai’ (The Free Voice), a book by Ravish Kumar

(चयन एवं प्रस्तुति: आमिर)

 

“हर बात को लोगों की निगाह में सही या ग़लत होते देखना ख़ुद को ऐसी सूली पर चढ़ा देना है, जहाँ ज़िन्दगी और मौत का फ़ासला एक नज़र के बदल जाने से तय होता है।”


“आशंकाएँ आपको जर्जर बनाती हैं।”


“डर बाहर से आता है और हौसला भीतर से।”


“अँधेरे का फ़ैसला सत्ता करती है, सूरज नहीं।”


“डर वास्तविक भी होता है और काल्पनिक भी, लेकिन सच यही है कि काल्पनिक डर के तार भी वास्तविक डर से जुड़े होते हैं।”


“ख़ुद से लड़े बिना कोई बोल नहीं सकता।”


“सत्य का मतलब सिर्फ़ तथ्य नहीं होता। सत्य का मतलब समय, उस समय का माहौल और उसके भीतर मौजूद संस्थाओं का तंत्र भी होता है।”


“साहस कुछ और नहीं, डर के एक घेरे से निकलकर दूसरे घेरे से निकलने का संघर्ष है।”


“ग़लत सूचनाओं के आधार पर अपनी मूल चेतना को स्थगित कर देने की प्रक्रिया किसी भी जनता को फ़ेक पब्लिक में बदल देती है।”


“फ़ेक न्यूज़ जनता को रोबोट में बदलने की प्रक्रिया है।”


“जो समाज इतिहास के ज़रूरी सबक भूल जाता है, वह अपने भविष्य को ख़तरे में डालता है।”


“हम इतिहास की क्रूरताओं को फ़ासीवाद और साम्प्रदायिकता जैसे शब्दों में समेट देते हैं, मगर इन सन्दूक़ों को खोलकर देखिए। आपके ऊपर कंकाल झपट पड़ेंगे।”


“जो इतिहास से सबक नहीं लेते हैं, वो आने वाले इतिहास के लिए हत्यारे बन जाते हैं।”


“जब भीड़ का साम्राज्य बन जाता है तब कुतर्क हमारे दिलो-दिमाग़ पर राज करने लगता है।”


“अहिंसा नफ़रतों के कुचक्र से मुक्ति का मार्ग है।”


“मेरी राय में भीड़ बनने का मतलब है, कभी भी और कहीं भी हिटलर का जर्मनी बन जाना।”


“देश सही सूचनाओं से बनता है। फ़ेक न्यूज़, प्रोपगैण्डा और झूठे इतिहास से हमेशा भीड़ बनती है।”


” ‘इश्क़ कोई रोग नहीं’ टाइप के सिण्ड्रोम से बाहर निकलिए। इश्क़ के लिए स्पेस कहाँ है, डिमाण्ड कीजिए। पैंतीस साल के साठ प्रतिशत नौजवानो, तुम सिर्फ़ मशीनों के कल-पुर्ज़े बनाने और दुकान खोलने नहीं आए हो। तुम्हारी जवानी तुमसे पूछेगी, बताओ, कितना इश्क़ किया, कितना काम किया? काम से ही इश्क़ किया तो फिर जीवन क्या जिया? किसी की आँखों में देर तक देखते रहने का जुनून ही नहीं हुआ तो आपने देखा ही क्या?”


“हमारे शहरों में प्रेम की कोई जगह नहीं है। पार्क का मतलब हमने इतना ही जाना कि गेंदे और बोगनवेलिया के फूल खिलेंगे। कुछ रिटायर्ड लोग दौड़ते मिलेंगे। दो-चार प्रेमी होंगे, जिन्हें लोग घूर रहे होंगे। कहीं बैठने की कोई मुकम्मल जगह नहीं है। इश्क़ के लिए जगह भी चाहिए।”


“चाहना सिर्फ़ ‘आई लव यू’ बोलना नहीं है। चाहना किसी को जानना है और किसी के लिए ख़ुद अपने को भी जानना है।”


“इश्क़ हमें थोड़ा कमज़ोर, थोड़ा संकोची बनाता है। एक बेहतर इंसान में ये कमज़ोरियाँ न हों तो वह शैतान बन जाता है।”


“धर्म और जाति ने हम सबको हमेशा के लिए डरा दिया है। हम प्रेम के मामूली क्षणों में गीत तो गाते हैं परिंदों की तरह उड़ जाने के, मगर पाँव जाति और धर्म के पिंजड़े में फड़फड़ा रहे होते हैं। भारत के प्रेमियों के हिस्से में प्रेम कम, नफ़रत ही अधिक आती है। उन्हें सलाम कि इसके बाद भी वे प्रेम कर गुज़रते हैं।”


“जो नौजवान प्रेम नहीं करता, अपनी पसंद से शादी नहीं करता, वह हमेशा हमेशा के लिए बुज़दिल हो जाता है, डरपोक हो जाता है।”


“अभद्रता मीडिया की नई भद्रता है।”


“जो सूचनाविहीन होता है, वह प्रेमविहीन भी होता है।”

 

पेरुमल मुरुगन की किताब 'पूनाची' से उद्धरण

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आमिर
हंस, स्त्रीकाल, चौपाल, कथादेश, मधुमती, अभिनव इमरोज़, अहा! ज़िंदगी, समकालीन जनमत, पोषम पा, हस्ताक्षर, प्रभात ख़बर (पटना और रांची) आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।उर्दू के प्रगतिशील शा'यर ज़फ़र गोरखपुरी के दोहों और निदा फ़ाज़ली की कुछ चुनिंदा नज़्मों का उर्दू से हिन्दी में अनुवाद।फोटोग्राफी, चित्रकला और सिनेमा में विशेष रूचि।संपर्क : [email protected]

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