‘Sundar Aur Achchhi’, a poem by Ritika Srivastava

दिनों के बाद जैसे ही मैंने घर पर क़दम रक्खा
माँ संग मेरी बातें शुरू हुईं
इससे पहले कि वो कुछ पूछती
और मैं कुछ बताती
माँ ने बात छेड़ दी एक भाई की शादी की
बात शुरू की माँ ने उसकी साथी की
जो कुछ दिन पहले सामाजिक तौर तरीक़ों से व्याह कर लायी गयी थी
माँ ने बताना शुरू किया
नयी बहू बहुत सुन्दर है
सुन्दर है अच्छी है
अच्छी है क्योंकि सुन्दर है
सुन्दर है इसलिए अच्छी है
वो पी.एच.डी है पर सुन्दर है
घर का काम सब आता है वो अच्छी है
हमारी जाति की है वो अच्छी है
विदाई में रोयी वो अच्छी है
किसी को नज़र उठाकर नहीं देखा वो अच्छी है
साड़ी अच्छे-से पहनी वो सुन्दर है

इस तरह एक-दो मिनट में
सुन्दर और अच्छी बहू को परिभाषित किया जा रहा है
और व्याही लड़कियों की समझ को बनाया जा रहा है!

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