Tag: Adarsh Bhushan

Adarsh Bhushan

दिसम्बर

दिसम्बर एक दौड़ है पतली-सी रेलिंग पर भागती हुई गिलहरी की दौड़जिसे कहीं जाना नहीं है रुकना है यहीं बग़ल के किसी सूखते सेमल की कोटर मेंठण्ड के थोड़ा...
Adarsh Bhushan

लोहा और कपास

आँतों को पता है अपने भूखे छोड़े जाने की समय सीमा उसके बाद वे निचुड़तीं पेट कोंच-कोंचकर ख़ुद को चबाने लगती हैंआँखों को पता है कितनी दुनिया देखने...
Adarsh Bhushan

त्राण

दो ज़िन्दा प्रेमियों का प्रेम कभी एक जैसा नहीं दिखता यह हो सकता है कि एक मन देखता हो और एक त्राण की सम्भावनादो ज़ंग खायीं तलवारें अलग-अलग युद्धों से आयी...
Farmers

वे बैठे हैं

वे बैठे हैं पलथी टिकाए आँख गड़ाएअपनी रोटी बाँधकर ले आए हैं, रखते हैं तुम्हारे सामने अपने घरों के चूल्हे, आश्वासन नहीं माँगते तुमसे माँगते हैं रोटी के बदले रोटीअपने...
Dictatorship

सुनो तानाशाह!

सुनो तानाशाह! एक दिन चला जाऊँगा एक नियत दिन जो कई वर्षों से मेरी प्रतीक्षा में बैठा हैमेरी जिजीविषा का एक दिन जिसका मुझे इल्म तक नहीं है— क्या...
Adarsh Bhushan

यायावर

जो अप्राप्य है मुझे उसकी तलाश में भटकूँगा ध्रुव की तरह स्थापित हो जाऊँगा किसी दिशा में या नचिकेता की तरह यात्रा से उत्तरोत्तर लौटूँगास्मृतियों की सतहें बनाऊँगा एक...
Leaf, Autumn, Plant

अक्टूबर

यह अक्टूबर फिर से बीतने को है साल-दर-साल इस महीने के साथ तुम बीत जाती हो एक बार पूरा बीतकर भी फिर वहीं से शुरू हो जाता है...
Blind

मत भूलना

मत भूलना कि हर झूठ एक सच के सम्मुख निर्लज्ज प्रहसन है हर सच एक झूठ का न्यायिक तुष्टिकरण तुम प्रकाश की अनुपस्थिति का एक टुकड़ा अंधकार अपनी आँखों...
Hungry, Poor

ग़ायब लोग

हम अक्षर थे मिटा दिए गए क्योंकि लोकतांत्रिक दस्तावेज़ विकास की ओर बढ़ने के लिए हमारा बोझ नहीं सह सकते थेहम तब लिखे गए जब जन गण मन लिखा...
Adarsh Bhushan

यात्रा

मेरी सारी यात्राएँ किसी अगणित एकान्त के ऊहापोह में डूबी हुई हैंइस देह को लिए फिरता मैं अपने शयन कक्ष से एक क्रमबद्ध पदचाप की ताल पर किसी यात्रा...
Adarsh Bhushan

आदमियत से दूर

आदमी क्या करता है जुगुप्साओं से आक्रांत होकर चीख़ने के बाद गहरे मौन में चला जाता हैआदिम हथियारों पर धार लगाता है नोचता-बकोटता है फिर नाख़ून काटकर अपने सभ्य होने का...
Adarsh Bhushan

बंदोबस्त

शहर ख़ाली हो चुके हैं लोगों से, जब तक कोई बसता था यहाँ उदासी ढोता था ताने खाता था और लानत ओढ़कर सो जाता थाखिन्न और अप्रसन्न लोग भड़के और...

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'शहर से दस किलोमीटर' ही वह दुनिया बसती है जो शहरों की न कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने...
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सड़कें कहीं नहीं जातीं सड़कें कहीं नहीं जातीं वे बस करती हैं दूरियों के बीच सेतु का काम, दो बिंदुओं को जोड़तीं रेखाओं की तरह, फिर भी वे पहुँचा देती...
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गीतांजलि श्री – ‘रेत समाधि’

गीतांजलि श्री का उपन्यास 'रेत समाधि' हाल ही में इस साल के लिए दिए जाने वाले बुकर प्राइज़ के लिए चयनित अन्तिम छः किताबों...
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तुम देखना चांद तुम देखना चांद एक दिन कविताओं से उठा ज्वार अपने साथ बहा ले जाएगा दुनिया का तमाम बारूद सड़कों पर क़दमताल करते बच्चे हथियारों को दफ़न...
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श्यामबिहारी श्यामल जी के साथ संगीता पॉल की बातचीत

जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित उपन्यास 'कंथा' का साहित्यिक-जगत में व्यापक स्वागत हुआ है। लेखक श्यामबिहारी श्यामल से उपन्यास की रचना-प्रकिया, प्रसाद जी...
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