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कविता की परीक्षा
'Kavita Ki Pareeksha', a poem by Nishant Upadhyay
ईश्वर की परिभाषा क्या है?
हर धर्म के अपने ईश्वर होते हैं।
धर्म की परिभाषा क्या है?
धर्म ईश्वर से...
ईश्वर की खोज
गर्दन उठाकर ईश्वर को आकाश में खोजने वालों
तुमने ही धरती को रक्तपात दिया है
तुमने ही हमें मज़हबों में बाँट दिया है
तुम ही करते आए हो अपराध
और...
भ्रम
स्मृतियों में
सहेजने के तौर पर
दिए गए सभी चुम्बन
पीड़ा में ऐसे भ्रम बनाए रखते हैं,
मानो आँख खुलते ही
ईश्वर सामने नज़र आ जाएगा।
यूँ बंद आँखों के...
ऐसा सोचना ठीक नहीं
शेर-चीता नहीं,
मनुष्य एक हिंसक प्राणी है।
हिंसा का बहाना चाहिए अहिंसा को
ईश्वर का बहाना,
सबसे ज़्यादा ख़ून बहाने वाला है
सबसे ज़्यादा पवित्र बहाना।
इसे नकारने का मानुष बहुत कम...
ईश्वर नहीं आया
कहाँ हैं वो!
जो अब भी कहते हैं कि
ईश्वर सब देख रहा है!
मैं पूछना चाहती हूँ
तुम्हारे ईश्वर ने कब-कब
क्या-क्या देखा?
उसे ख़ुद की स्तुतिगान और प्रशंसा सुनने...
ख़ुदा
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने!
काले घर में सूरज रख के
तुमने शायद सोचा था मेरे सब मोहरे पिट जाएँगे
मैंने एक चराग़...
बासी भात में खुदा का साझा
शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई है, तो गौरी...
रिक्त मन
अंजुरी भर प्रार्थनाएँ
बड़ी मुश्किल से जुटा पाती हूँ
विषमता से उपजा
आर्तगान!
श्रद्धा के दुर्लभ पुष्प
आस के तरु से
सहेजकर रखती हूँ
विभिन्न रंग की अनगिनत
कामना के संग।
हे देव!
विषमता...
मेरा ईश्वर छली नहीं है
पता नहीं कितने तरीके
ईजाद किए हैं मनुष्य ने
तुम्हें समृद्ध बनाने के लिए।
हर कोस पर तुम्हारा
स्वरूप बदला है
पानी के साथ
पर स्मरण रहे
तुम्हारे ईश्वर ने
तुम्हारी आत्मा
को उतना...
मैं तो कहीं भी नहीं दिखता
मैं तो कहीं भी नहीं दिखता,
ना शाश्वत ना सीमित;
मेरा दिखना जायज़ भी नहीं।
शायद मुझे तुम
धर्म में देखना शुरू कर दो
या रंगो में,
जो युगान्तरकालीन
मरणशील हाड़-मांस...
एक वोट से हारे भगवान
संविधान का जब हो रहा था निर्माण
तब आया था एक व्यवधान
सवाल ये था कि आखिर
संविधान की शुरुआत होगी किसके नाम।
सच भी ये था कई...
ईश्वर से अनुबन्ध है प्रेम का
जब समंदर की
हरहराती लहरें सब लील
लेने को आतुर हो उठती हैं
नदियाँ नष्ट कर डालती हैं
अपनी गोद में पलती और जवान होती
सभ्यताओं को भी
जंगलों के पेड़...







