Read here the best Hindi Love Poems and Stories
Tag: प्रेम
प्रभात की कविताएँ
क़स्बे का कवि
वह कोई अधिकारी नहीं है कि लोग
जी सर, हाँ सर कहते हुए काँपें उसके सामने
नेता नहीं है कि इंसानों का समूह
पालतू कुत्तों के...
प्रेम और चालीस पार की औरतें
'Prem Aur Chalis Paar Ki Auratein', Hindi Kavita by Anupama Jha
जब प्रेम कविता लिखती हैं
चालीस, पचास पार की औरतें
तो लगाये जाते हैं
विशेषणों के भी,...
और मैंने गढ़ा प्रेम
'Aur Maine Gadha Prem', a poem by Santwana Shrikant
मैंने नींद माँगी थी
तुमने बदल दिया इसे
स्याह रातों के ख़ौफ़ में।
मैं प्रेम की नदी
बनकर बही
तुमने खड़ी कर...
प्रतीक्षा
'Prateeksha', Hindi Kavita by Rashmi Saxena
समुद्र की सभी लहरें
शंकाओ से घिरी
प्रेमिकाएँ हैं जो आ-आकर
तटों पर टहलतीं और
लौट जातीं
प्रेमी के वापस आने की
आस में
साँसों की भट्टी...
प्रेम बहुत मासूम होता है
'Prem Bahut Masoom Hota Hai', a poem by Vijay Rahi
प्रेम बहुत मासूम होता है
यह होता है बिल्कुल उस बच्चे की तरह
टूटा है जिसका दूध...
बोझ
यह कविता यहाँ सुनें:
https://youtu.be/KUtFhk9GFqA
एक बोझ था;
मेरे अंदर
जो लिए घूमता था,
ट्रेनों में,
बसों में,
सड़कों पर,
आज उसी चौराहे पर
उतार दिया है वो बोझ,
जहाँ सब शुरू हुआ था,
निश्चय...
क्यों इन तारों को उलझाते?
क्यों इन तारों को उलझाते?
अनजाने ही प्राणों में क्यों
आ-आकर फिर जाते?
पल में रागों को झंकृत कर,
फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
मेरी लघु जीवन वीणा...
ज़ख़्मी गाल
'Zakhmi Gaal', a poem by Rahul Boyal
जब मैं उससे मिला
उसकी आँखें भर आयीं
मुझे ख़बर ही न पड़ी
कब मेरा सीना ख़ाली हो गया
मैंने बस उसे...
प्रेम-प्रेमी
प्रेम लगाए लहू अधर पे
कुतर-कुतर प्रेमी को खाए,
माँस का टुकड़ा मिले दाँत में
आँख में मिले वियोग की हाय।
नयन से बहे नीर की धारा
प्रेम बेचारा सिसकत...
दिल चुराकर न हमको
दिल चुराकर न हमको बुलाया करो
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया...
तुम मुझे क्षमा करो
'Tum Mujhe Kshama Karo', a poem by Rajkamal Choudhary
बहुत अँधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।
मुस्कुराहटें मेरी विवश
किसी भी चन्द्रमा के चतुर्दिक
उगा नहीं पायी आकाश-गंगा
लगातार फूल...
चन्द्रमुखी!
बहुत अँधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।
मुस्कुराहटें मेरी...
तुम्हारा पत्र आया
तुम्हारा पत्र आया, या
अँधेरे द्वार में से झाँककर कोई
झलक अपनी, ललक अपनी
कृपामय भाव-द्युति अपनी
सहज दिखला गया मानो
हितैषी एक!
हमारे अन्धकाराच्छन्न जीवन में विचरता है
मनोहर सौम्य...











