Tag: विरह / जुदाई

Narendra Sharma

आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे

आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे! आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? सत्य हो यदि, कल्प...
Muktibodh

एक-दूसरे से हैं कितने दूर

एक-दूसरे से हैं कितने दूर कि जैसे बीच सिन्धु है, एक देश के शैल-कूल पर खड़ा हुआ मैं और दूसरे देश-तीर पर खड़ी हुईं तुम। फिर भी...
God, Abstract Human

तारबंदी

जालियों के छेद इतने बड़े तो हों ही कि एक ओर की ज़मीन में उगी घास का दूसरा सिरा छेद से पार होकर साँस ले सके दूजी हवा में तारों की इतनी...
Rag Ranjan

किसके घर में

एक दरवाज़ा है जो दो दुनियाओं को एक-दूसरे से अलग करता है इसके कम से कम एक ओर हमेशा अंधेरा रहता है घर से निकलते वक़्त...
Man, Woman, Butterfly, Abstract, Merge

आहट

सच कहो तो अब करनी होगी खुलकर बात कि ठीक कौन-सा क्षण था वह जब फूलों ने डाल दी थीं गर्दनें और एक सिसकी बहुत धीमे-से फूट पड़ी थी डाल-डाल से वैसे...
Prabhat

हमें नहीं पता

तुम अगर मिल सकती होतीं या मैं तुमसे मिल सकता होता तो ज़रूर मिल लेते बावजूद हमारे बीच फैले घने कोहरे के इसी में ढूँढते हुए हम एक-दूसरे...
Vishnu Khare

अकेला आदमी

अकेला आदमी लौटता है बहुत रात गए या शायद पूरी रात बाद भी घर के ख़ालीपन को स्मृतियों के गुच्छे से खोलता हुआ अगर वे लोग...
Rag Ranjan

बेटिकट

एक ट्रेन का सपना देखता हूँ मैं जो अतीत के किसी स्टेशन से छूटती है और बेतहाशा चलती चली जाती है समय की किसी अज्ञात दिशा में मैं सवार...
Girl sitting on grass

प्रेम में मिलना मत

'Prem Mein Milna Mat', a poem by Vandana Kapil उन जगहों ने अपना अस्तित्व खो दिया जिन्हें गवाह होना था उन मौन पलों का जहाँ निःशब्द बन वो पहरों शब्द...
Anurag Anant

कवि, कील और कविता

'Kavi, Keel Aur Kavita', a poem by Anurag Anant सबने नाव देखी किसी ने नाव की देह में धँसी कीलें नहीं देखीं इन्हीं कीलों ने नाव को...
Sarveshwar Dayal Saxena

तुमसे अलग होकर

तुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं...
Parveen Shakir

जुदाई की पहली रात

'Judai Ki Pehli Raat', a nazm by Parveen Shakir आँख बोझल है मगर नींद नहीं आती है मेरी गर्दन में हमाइल तिरी बाँहें जो नहीं किसी करवट भी...
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