Tag: विरह / जुदाई
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे!
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
सत्य हो यदि, कल्प...
एक-दूसरे से हैं कितने दूर
एक-दूसरे से हैं कितने दूर कि जैसे
बीच सिन्धु है, एक देश के शैल-कूल पर खड़ा हुआ मैं
और दूसरे देश-तीर पर खड़ी हुईं तुम।
फिर भी...
तारबंदी
जालियों के छेद
इतने बड़े तो हों ही
कि एक ओर की ज़मीन में उगी
घास का दूसरा सिरा
छेद से पार होकर
साँस ले सके
दूजी हवा में
तारों की
इतनी...
किसके घर में
एक दरवाज़ा है जो दो दुनियाओं को एक-दूसरे से अलग करता है
इसके कम से कम एक ओर हमेशा अंधेरा रहता है
घर से निकलते वक़्त...
आहट
सच कहो तो अब
करनी होगी खुलकर बात कि
ठीक कौन-सा क्षण था वह
जब फूलों ने डाल दी थीं गर्दनें
और एक सिसकी
बहुत धीमे-से
फूट पड़ी थी डाल-डाल से
वैसे...
हमें नहीं पता
तुम अगर मिल सकती होतीं
या मैं तुमसे मिल सकता होता
तो ज़रूर मिल लेते
बावजूद हमारे बीच फैले घने कोहरे के
इसी में ढूँढते हुए हम एक-दूसरे...
अकेला आदमी
अकेला आदमी लौटता है बहुत रात गए या शायद पूरी रात बाद भी
घर के ख़ालीपन को स्मृतियों के गुच्छे से खोलता हुआ
अगर वे लोग...
बेटिकट
एक ट्रेन का सपना देखता हूँ मैं
जो अतीत के किसी स्टेशन से छूटती है
और बेतहाशा चलती चली जाती है
समय की किसी अज्ञात दिशा में
मैं सवार...
प्रेम में मिलना मत
'Prem Mein Milna Mat', a poem by Vandana Kapil
उन जगहों ने अपना
अस्तित्व खो दिया
जिन्हें गवाह होना था
उन मौन पलों का
जहाँ निःशब्द बन वो पहरों
शब्द...
कवि, कील और कविता
'Kavi, Keel Aur Kavita', a poem by Anurag Anant
सबने नाव देखी
किसी ने नाव की देह में धँसी कीलें नहीं देखीं
इन्हीं कीलों ने नाव को...
तुमसे अलग होकर
तुमसे अलग होकर लगता है
अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं,
और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में
गिरता जा रहा हूँ।
अब कहीं कोई यात्रा नहीं...
जुदाई की पहली रात
'Judai Ki Pehli Raat', a nazm by Parveen Shakir
आँख बोझल है
मगर नींद नहीं आती है
मेरी गर्दन में हमाइल तिरी बाँहें जो नहीं
किसी करवट भी...










