Tag: Trilochan

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इलाहाबादी

काफ़े रेस्त्राँ में हिलमिल कर बैठे। बातें कीं; कुछ व्यंग्य-विनोद और कुछ नये टहोके लहरों में लिए-दिए। अपनी-अपनी घातें रहे ताकते। यों, भीतर-भीतर मन दो के एक न...
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तुम्हें सौंपता हूँ

फूल मेरे जीवन में आ रहे हैंसौरभ से दसों दिशाएँ भरी हुई हैं मेरी जी विह्वल है मैं किससे क्या कहूँआओ, अच्छे आए समीर, ज़रा ठहरो फूल जो पसंद हों,...
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आज मैं तुम्हारा हूँ

कल मेरे प्राणों में कोई रो रहा था। बाहर सब शान्त था। भीतर-भीतर भारी व्यथा भर गई थी। जी बड़ा उदास था। कौन-सी हवा...
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धूप सुन्दर

धूप सुन्दर धूप में जग-रूप सुन्दर सहज सुन्दरव्योम निर्मल दृश्य जितना स्पृश्य जितना भूमि का वैभव तरंगित रूप सुन्दर सहज सुन्दरतरुण हरियाली निराली शान शोभा लाल पीले और नीले वर्ण वर्ण प्रसून सुन्दर धूप सुन्दर धूप में जग-रूप...
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तुम्हें जब मैंने देखा

पहले पहल तुम्हें जब मैंने देखा सोचा था इससे पहले ही सबसे पहले क्यों न तुम्हीं को देखा!अब तक दृष्टि खोजती क्या थी, कौन रूप, क्या रंग देखने को उड़ती थी ज्योति-पंख...
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गाओ

मेरे उर के तार बजाकर जब जी चाहा तुमने गाया गीत। मौन मैं सुनने वाला कृपापात्र हूँ सदा तुम्हारा, चुनने वाला स्वर-सुमनों का। भीड़ भरा है, जो...
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स्नेह मेरे पास है

स्नेह मेरे पास है, लो स्नेह मुझसे लो!चल अन्धेरे में न जीवन दीप ठुकराओ साँस के संचित फलों को यों न बिखराओ पत्थरों से बन्धु अपना सिर...
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मैं तुम

'मैं' सबका मैं है वैसे ही 'तुम' सबका तुम हैलेकिन मैं कहाँ हूँ कहाँ हूँ मुझे जान लेना है तुम मेरी परेशानी अगर नहीं जानते तो तुम्हारी हानि...
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हम दोनों हैं दुःखी

हम दोनो हैं दुःखी। पास ही नीरव बैठें, बोलें नहीं, न छुएँ। समय चुपचाप बिताएँ, अपने-अपने मन में भटक-भटककर पैठें उस दुःख के सागर में, जिसके तीर...
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दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें

दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें चारों ओर खड़ी हैं। तुम चुपचाप खड़े हो हाथ धरे छाती पर; मानो वहीं गड़े हो। मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्‍के मारें और ढहा...
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खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार अपरिचित पास आओ! आँखों में सशंक जिज्ञासा मुक्ति कहाँ, है अभी कुहासा जहाँ खड़े हैं, पाँव जड़े हैं स्तम्भ शेष भय की परिभाषा हिलो...
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गद्य-वद्य कुछ लिखा करो

गद्य-वद्य कुछ लिखा करो। कविता में क्या है। आलोचना जगेगी। आलोचक का दरजा – मानो शेर जंगली सन्नाटे में गरजा ऐसा कुछ है। लोग सहमते हैं। पाया...

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या देवी

1सृष्टि की अतल आँखों में फिर उतरा है शक्ति का अनंत राग धूम्र गंध के आवक स्वप्न रचती फिर लौट आयी है देवी रंग और ध्वनि का निरंजन...
Chen Kun Lun

चेन कुन लुन की कविताएँ

चेन कुन लुन का जन्म दक्षिणी ताइवान के काओशोंग शहर में सन 1952 में हुआ। वह एक सुधी सम्पादक रहे हैं। चेन लिटरेरी ताइवान...
Bharat Ke Pradhanmantri - Rasheed Kidwai

किताब अंश: भारत के प्रधानमंत्री

सुपरिचित पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई की किताब 'भारत के प्रधानमंत्री : देश, दशा, दिशा' भारत के पहले प्रधानमंत्री से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री...
Muktibodh - Premchand

मेरी माँ ने मुझे प्रेमचन्द का भक्त बनाया

एक छाया-चित्र है। प्रेमचन्द और प्रसाद दोनों खड़े हैं। प्रसाद गम्भीर सस्मित। प्रेमचन्द के होंठों पर अस्फुट हास्य। विभिन्न विचित्र प्रकृति के दो धुरन्धर...
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लगभग विशेषण हो चुका शासक

किसी अटपटी भाषा में दिए जा रहे हैं हत्याओं के लिए तर्क'एक अहिंसा है जिसका सिक्का लिए गांधीजी हर शहर में खड़े हैं लेकिन जब भी सिक्का उछालते...
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किसान को कौन जानता है?

हवा को जितना जानता है पानी कोई नहीं जानतापानी को जितना जानती है आग कोई नहीं जानताआग को जितना जानते हैं पेड़ कोई नहीं जानतापेड़ को जितना...
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सवा सेर गेहूँ

किसी गाँव में शंकर नाम का एक कुरमी किसान रहता था। सीधा-सादा ग़रीब आदमी था, अपने काम-से-काम, न किसी के लेने में, न किसी...
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वे आपके बारे में बहुत ज़्यादा जानते हैं (किताब अंश: अनसोशल नेटवर्क)

'अनसोशल नेटवर्क' किताब भारत के विशिष्ट सन्दर्भों में सोशल मीडिया का सम्यक् आकलन प्रस्तुत करती है। जनसंचार का नया माध्यम होने के बावजूद, सोशल...
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अनुत्तरित प्रार्थना

'परिवर्तन प्रकृति का नियम है' यह पढ़ते-पढ़ाते वक़्त मैंने पूरी शिद्दत के साथ अपने रिश्तों में की स्थिरता की कामनाप्रकृति हर असहज कार्य भी पूरी सहजता के...
Women sitting

अठन्नी, चवन्नी और क्रमशः

इस बार उन्हें नहीं था मोह स्वर्ण-मृग का फिर भी खींची गई थीं लक्ष्मण रेखाएँवे पढ़ीं, आगे बढ़ीं लक्ष्मण रेखाएँ लाँघकर रावण से जा भिड़ींगूँजते आए थे स्वर नेपथ्य...
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