मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के उद्धरण | Mushtaq Ahmad Yusufi Quotes in Hindi


“दुश्मनी के लिहाज़ से दुश्मनों के तीन दर्जे होते है—दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार।”


“आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाए तो ज़िन्दगी-भर प्रोफ़ेसर ही रहता है, चाहे बाद में वह समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे!”


“लाहौर की चंद गलियाँ इतनी तंग हैं कि अगर एक तरफ़ से मर्द और दूसरी तरफ़ से औरत गुज़र रही हो तो दरमियाँ में सिर्फ़ निकाह की गुंजाइश रह जाती है।”


“समझदार आदमी नज़र हमेशा नीची और नियत ख़राब रखता है।”


“मुझे इस पर क़तई ताज्जुब नहीं होता कि हमारे मुल्क में पढ़े-लिखे लोग ख़ूनी पेचिश का इलाज तावीज़-गण्डों से करते हैं। ग़ुस्सा इस बात पर आता है कि वो वाक़ई अच्छे हो जाते हैं।”


“बढ़िया सिगरेट पीते ही हर शख़्स को माफ़ कर देने का जी चाहता है, चाहे वो रिश्तेदार ही क्यों न हो!”


“इस्लाम के लिए सबसे ज़्यादा क़ुर्बानी बकरों ने दी है।”


“इस्लामिक वर्ल्ड में आज तक कोई बकरा नेचुरल डेथ नहीं मरा।”


“लफ़्ज़ों की जंग में फ़तह किसी भी फ़रीक़ की हो, शहीद हमेशा सच्चाई होती है।”


“जो देश जितना ग़रीब होगा, उसमें उतना ही आलू और मज़हब का चलन ज़्यादा होगा।”


“नाई की ज़रूरत सारी दुनिया को रहेगी जब तक कि सारी दुनिया सिक्ख धर्म ना अपना ले और सिक्ख ऐसा कभी होने नहीं देंगे।”


“जो अपने माज़ी को याद ही नहीं करना चाहता, वो यक़ीनन लोफ़र रहा होगा।”


“अपनी शादी तो इस तरह हुई, जैसे लोगों की मौत होती है। अचानक, बग़ैर मर्ज़ी के।”


“मूँगफली और आवारगी में ख़राबी ये है कि आदमी एक दफ़ा शुरू कर दे तो समझ में नहीं आता कि ख़त्म कैसे करे।”


“एक फ़्रेंच अदीबा क्या ख़ूब कह गयी हैं कि मैं आदमियों को जितने क़रीब से देखती हूँ, उतने ही कुत्ते अच्छे लगते हैं।”


“मौसम, माशूक़ और हुकूमत का गिला हमेशा से हमारा क़ौमी तफ़रीह मशग़ला रहा है।”


“दुनिया में ग़ालिब वो अकेला शायर है जो समझ में ना आया तो दुगना मज़ा देता है।”


“कुछ लोग इतने मज़हबी होते हैं कि जूता पसन्द करने के लिए भी मस्जिद का रुख़ करते हैं।”


“मेरा ताल्लुक़ उस भोली-भाली नस्ल से है जो ये समझती है कि बच्चे बुज़ुर्गों की दुआओं से पैदा होते हैं।”


“हमारे ज़माने में तरबूज़ इस तरह ख़रीदा जाता था जैसे आज कल शादी होती है… सिर्फ़ सूरत देखकर।”


“सिर्फ 99 प्रतिशत पुलिस वालों की वजह से बाक़ी 1 प्रतिशत भी बदनाम हैं।”


“हुकूमतों के अलावा कोई भी अपनी मौजूदा तरक़्क़ी से ख़ुश नहीं होता।”


“फूल जो कुछ ज़मीं से लेते हैं, उससे कहीं ज़्यादा लौटा देते हैं।”


“हमारे मुल्क की अफ़वाहों की सबसे बड़ी ख़राबी ये है कि वो सच निकलती हैं।”


“हर ऐसी मुहिम पर शक करो, फ़ज़ीहत भरी जानो जिसके लिए नये कपड़े पहनने पड़ें।”


खलील जिब्रान की किताब 'नास्तिक' से उद्धरण

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मुशताक़ अहमद यूसुफ़ी
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी उर्दू के प्रसिद्ध व्यंग्यकार और हास्य लेखक थे।

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