नानी का संदूक निराला,
हुआ धुएँ से बेहद काला।
पीछे से वह खुल जाता है,
आगे लटका रहता ताला!

चंदन चौकी देखी उसमें,
सूखी लौकी देखी उसमें,
बाली जौ की देखी उसमें,
खाली जगहों में है जाला,
नानी का संदूक निराला!

शीशी गंगा जल की उसमें,
ताम्रपत्र, तुलसीदल उसमें,
चींटा, झींगुर, खटमल उसमें,
जगन्नाथ का भात उबाला,
नानी का संदूक निराला!

मिलता उसमें कागज कोरा,
मिलता उसमें सुई व डोरा,
मिलता उसमें सीप-कटोरा,
मिलती उसमें कौड़ी माला,
नानी का संदूक निराला!

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ठाकुर श्रीनाथ सिंह
श्रीनाथ सिंह (१९०१ - १९९६) द्विवेदी युग के हिन्दी साहित्यकार हैं। इन्होने "सरस्वती" का भी संपादन किया था। उनका जन्म १९०१ ई० में इलाहाबाद जिले के मानपुर ग्राम में हुआ था। इन्होने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया था। हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर अधिवेशन में वे महात्मा गाँधी द्वारा सम्मलेन के प्रबंध मंत्री नियुक्त किये गये, बाद में वे हिंदी साहित्य सम्मलेन के सभापति भी हुए। वे तात्कालीन संयुक्त प्रान्त सरकार (१९४६-४७) द्वारा गठित समाचार पत्र उद्योग जांच समिति के सदस्य भी थे।