प्रस्तुति: पुनीत कुसुम

 

“मुझे यह उपन्यास लिखकर कोई ख़ुशी नहीं हुई।”

 

“समय के सिवा कोई इस लायक़ नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाए।”

 

“यह पूरा उपन्यास एक गन्दी गाली है। और मैं यह गाली डंके की चोट पर बक रहा हूँ। यह उपन्यास अश्लील है―जीवन की तरह।”

 

“अब कोई केवल शरीफ़ नहीं रह गया है। हर शरीफ़ के साथ एक दुमछल्ला लगा हुआ है। हिन्दू शरीफ़, मुसलमान शरीफ़, उर्दू शरीफ़, हिन्दी शरीफ़ : और बिहार शरीफ़! दूर-दूर तक शरीफ़ों का एक जंगल फैला हुआ है।”

 

“लगता ऐसा है कि ईमानदार लोगों को हिन्दू-मुसलमान बनाने में बेरोज़गारी का हाथ भी है।”

 

“अरे तो क्या यह लैला-मजनूँ और हीर-राँझा की कहानियाँ केवल प्रोपेगण्डा है?”
“यह कहानियाँ मिडिल क्लास के पैदा होने से पहले की हैं।”

 

“यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है कि इफ़्फ़न टोपी की कहानी का एक अटूट हिस्सा है। मैं हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं यह बेवक़ूफ़ी क्यों करूँ! क्या मैं रोज़ अपने बड़े या छोटे भाई से यह कहता हूँ कि हम दोनों भाई-भाई हैं? यदि मैं नहीं कहता तो क्या आप कहते हैं? हिन्दू-मुसलमान अगर भाई-भाई हैं तो कहने की ज़रूरत नहीं। यदि नहीं हैं तो कहने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा। मुझे कोई चुनाव तो लड़ना नहीं है। मैं तो एक कथाकार हूँ और एक कथा सुना रहा हूँ।”

 

“जब उसे रातें आँखों में काटने के बाद भी कोई ख़्वाब नहीं मिला तो उसने दाढ़ी रख ली। अल्लाह मियाँ की तरफ़ से उसका दिल साफ़ हुआ था। परन्तु वह एक सहमी हुई नस्ल का प्रतिनिधि था, इसलिए वह नमाज़ पढ़ने लगा।”

 

“इतिहास अलग-अलग बरसों या क्षणों का नाम नहीं है बल्कि इतिहास नाम है समय की आत्मकथा का।”

 

“नयी नस्ल तो हमारी नस्ल से भी ज़्यादा घाटे में है। हमारे पास कोई ख़्वाब नहीं है। मगर इनके पास तो झूठे ख़्वाब हैं।”

 

“क्राइसिस यह है कि किसी को ख़्वाबों के इस क्राइसिस का पता ही नहीं है।”

 

“कल का हिसाब-किताब करने बैठ गए तो सवेरा हो जाएगा।”

 

“चलो चाय पिलाओ और कांग्रेस वालों के लिए अपने बाप के नीले तेल की दो शीशियाँ मँगवा दो। उनकी पॉलिटिक्स के रगपट्ठे लुजलुजा गए हैं।”

 

“हिपोक्रेसी के जंगल में दो परछाइयों ने अपने-आपको अकेला पाया तो दोनों लिपट गईं।”

 

“आदमी और देवता में यही फ़र्क़ है शायद। ज़हर अकेले शिव पीते हैं। ज़हर अकेला सुक़रात पीता है। सलीब पर अकेले ईसा चढ़ते हैं। दुनिया त्यागकर एक अकेला राजकुमार निकलता है।”

 

“नफ़रत! शक! डर! इन्हीं तीन डोंगियों पर हम नदी पार कर रहे हैं। यही तीन शब्द बोए और काटे जा रहे हैं। यही शब्द धूल बनकर माँओं की छातियों से बच्चों के हलक़ में उतर रहे हैं। दिलों के बन्द किवाड़ों की दराज़ों में यही तीन शब्द झाँक रहे हैं। आवारा रूहों की तरह ये तीन शब्द आँगनों पर मण्डरा रहे हैं। चमगादड़ों की तरह पर फड़फड़ा रहे हैं और रात के सन्नाटे में उल्लुओं की तरह बोल रहे हैं। काली बिल्ली की तरह रास्ता काट रहे हैं। कुटनियों की तरह लगाई-बुझाई कर रहे हैं और गुण्डों की तरह ख़्वाबों की कुँआरियों को छेड़ रहे हैं और भरे रास्तों से उन्हें उठाए लिए जा रहे हैं। तीन शब्द! नफ़रत, शक, डर। तीन राक्षस।

 

“प्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते। मनुष्य मौत को जीत सकता है, परन्तु प्रश्न को नहीं जीत सकता। कोई-न-कोई प्रश्न दुम के पीछे लगा ही रहता है…”

 

“मुसलमान लड़कों के दिलों में दाढ़ियाँ और हिन्दू लड़कों के दिलों में चोटियाँ उगने लगीं। यह लड़के फ़िजिक्स पढ़ते हैं और कापी पर ओउम् या बिस्मिल्लाह लिखे बिना सवाल का जवाब नहीं लिखते।”

 

“वफ़ादारी की तराजू में दो ही पल्ले होते हैं मिस्टर!”

 

“कथाकारी की कला सुनाने से ज़्यादा न सुनाने की कला है।”

 

“किसी के पेपर पढ़ने से इंटीग्रेशन नहीं हो सकता। और जो हुआ भी तो लोग ज़्यादा-से-ज़्यादा आले अहमद सुरूर और रविन्द्र भ्रमर हो जाएँगे। नहीं भाई, मुझे सीधे-सादे कम्युनल हिन्दू-मुसलमान ज़्यादा पसन्द हैं।”

 

“टोपी किसी रोमैंटिक कहानी का हीरो नहीं था। वह किसी रोमैंटिक कहानी का हीरो हो भी नहीं सकता था। वह तो अपनी आत्मकथा का हीरो भी बड़ी मुश्किल से बन सका।”

 

“हमारी दुनिया में जिसके दलाल न हों, उसकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।”

 

“वह इस डर से बोलता रहता है कि चुप हुआ तो फिर शायद उसे भी यह याद न आए कि कभी उसके पास भी एक आवाज़ हुआ करती थी।”

 

“भाषा की लड़ाई दरअसल नफ़े-नुक़सान की लड़ाई है। सवाल भाषा का नहीं है। सवाल है नौकरी का!”

 

“सुना जाता है कि पहले ज़मानों में नौजवान, मुल्क जीतने, लम्बी और कठिन यात्राएँ करने, ख़ानदान का नाम ऊँचा करने के ख़्वाब देखा करते थे। अब वे केवल नौकरी का ख़्वाब देखते हैं। नौकरी ही हमारे युग का सबसे बड़ा एडवेंचर है! आज के फ़ाहियान और इब्ने-बतूता , वास्कोडिगामा और स्काट, नौकरी की खोज में लगे रहते हैं। आज के ईसा, मोहम्मद और राम की मंज़िल नौकरी है।”

 

“लाश! यह शब्द कितना घिनौना है। आदमी अपनी मौत से, अपने घर में, अपने बाल-बच्चों के सामने मरता है तब भी बिना आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं और आदमी सड़क पर किसी बलवाई के हाथों मारा जाता है, तब भी बिना आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं। भाषा कितनी ग़रीब होती है।”

 

“नौकरी! यह शब्द हमारी आत्मा के माथे पर ख़ून से लिखा हुआ है। यह शब्द ख़ून बनकर हमारी रगों में दौड़ रहा है। यह शब्द ख़्वाब बनकर हमारी नींद की हतक कर रहा है। हमारी आत्मा नौकरी के खूँटे से बँधी हुई लिपि की नाँद में चारा खा रही है।”

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