Tag: Death

Vijaydev Narayan Sahi

अभी नहीं

ठहरो अभी तुम्हारे मरने का वक़्त नहीं आया है गले में फँसी हुई रस्सी को खोल दो देखो, अभी भी खिड़की के बाहर खुली हुई हवा है इसमें...
Taking Center Stage, Abstract, Light, Death, Angel, Devil

मृत्युंजय

जीवन नहीं देखता रंग-रूप, जात-पात धरती के हृदय से कई फूल खिलते हैं! कुछ मुरझाए फूलों को भी धरती दाना-पानी देती है, हवा नहीं रुकती किसी पर आक्रोशित होकर, वर्षा होती ही...
Hand, Touch

घुँघरू परमार की कविताएँ

शीर्षासन देश, जो कि हमारा ही है इन दिनों शीर्षासन में है। इसे सीधा देखना है तो आपको उल्टा होना होगा। माथे में बारूद घुमड़ता रहता अक्सर आधे हाथ नीचे धंसे...
Rahul Sankrityayan

मृत्‍यु-दर्शन

घुमक्कड़ की दुनिया में भय का नाम नहीं है, फिर मृत्‍यु की बात कहना यहाँ अप्रासंगिक-सा मालूम होगा। तो भी मृत्‍यु एक रहस्‍य है,...
Kailash Vajpeyi

क्षणिकाएँ : कैलाश वाजपेयी

स्पन्दन कविता हर आदमी अपनी समझ-भर समझता है ईश्वर एक कविता है! मोमिन पूजाघर पहले भी होते थे, हत्याघर भी पहले होते थे हमने यही प्रगति की है दोनों को एक में मिला दिया। आदिम...
Kumar Mangalam

कुमार मंगलम की कविताएँ

रात के आठ बजे मैं सो रहा था उस वक़्त बहुत बेहिसाब आदमी हूँ सोने-जगने-खाने-पीने का कोई नियत वक़्त नहीं है ना ही वक़्त के अनुशासन में रहा हूँ कभी मैं सो...
Prabhat

‘जीवन के दिन’ से कविताएँ

कविता संग्रह: 'जीवन के दिन' - प्रभात चयन व प्रस्तुति: अमर दलपुरा याद मैं ज़मीन पर लेटा हुआ हूँ पर बबूल का पेड़ नहीं है यहाँ मुझे उसकी याद...
Ashok Vajpeyi

कितने दिन और बचे हैं?

कोई नहीं जानता कि कितने दिन और बचे हैं? चोंच में दाने दबाए अपने घोंसले की ओर उड़ती चिड़िया कब सुस्ताने बैठ जाएगी बिजली के एक तार पर और आल्हाद...
Manjula Bist

मृत्युदण्ड

1) यदि आप कटिबद्ध हैं या मजबूर हो चुके हैं एक इंसान को बग़ैर कोई सुबूत छोड़े मारने के लिए तो आप ज़्यादा कुछ न करें बस ...उसकी जड़ें हिलाते चले जाएँ देखना! ऐसा...
Om Prakash Valmiki

मौत का ताण्डव

1985 में देहरादून में काम करते समय ओमप्रकाश वाल्मीकि के आँखों के सामने कुछ मज़दूरों की मौत हो गयी थी, जिसके बाद फ़ैक्ट्री, इंजीनियर...

मौत कभी ख़त्म नहीं होती

'Maut Kabhi Khatm Nahi Hoti', a poem by Pratima Singh मौत ज़िन्दा रहती है हमेशा मोर्चरी के बाहर पहरा देते दढ़ियल की आँखों में, उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता कौन आया है...
Vijay Rahi

वहम

'Weham', a poem by Vijay Rahi मैंने जब-जब मृत्यु के बारे में सोचा कुछ चेहरे मेरे सामने आ गये जिन्हें मुझसे बेहद मुहब्बत है। हालाँकि यह मेरा एक...
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