Tag: विरोध

Naveen Sagar

अच्छी सरकार

यह बहुत अच्‍छी सरकार है इसके एक हाथ में सितार, दूसरे में हथियार है सितार बजाने और हथियार चलाने की तजुर्बेकार है इसका निशाना अचूक है क़ानून की एड़ियों वाले...
Strike, Protest, Dissent

हड़ताल का गीत

आज हम हड़ताल पर हैं। हड्डियों से जो चिपककर रह गई, उस खाल पर हैं। यह ख़बर सबको सुना दो इश्तहारों में लगा दो हम लड़ाई पर खड़े...
Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथ तुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फल मैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Mahesh Anagh

तप करके हम

तप करके हम भोजपत्र पर लिखते रहे ऋचा, कैसे लिखें वंदना सिंहासन के पाए पर। इधर क्रौंच की करुणा हम को संत बनाती है, उधर सियासत निर्वसना होकर आ जाती है, शब्द...
Alok Dhanwa

गोली दाग़ो पोस्टर

यह उन्नीस सौ बहत्तर की बीस अप्रैल है या किसी पेशेवर हत्यारे का दायाँ हाथ या किसी जासूस का चमड़े का दस्ताना या किसी हमलावर की दूरबीन...
Narendra Jain

एक दिन शिनाख़्त

एक दिन हमसे पूछा जाएगा हम क्या कर रहे थे? एक दिन हमसे पूछा जाएगा हमारी नींद कितनी गहरी थी? एक दिन हमसे पूछा जाएगा हमारी आवाज़ कौन छीनकर ले गया? एक दिन हमसे पूछा...
Dushyant Kumar

ईश्वर को सूली

मैंने चाहा था कि चुप रहूँ, देखता जाऊँ जो कुछ मेरे इर्द-गिर्द हो रहा है। मेरी देह में कस रहा है जो साँप उसे सहलाते हुए, झेल लूँ थोड़ा-सा संकट जो...
Shailendra

हर ज़ोर-ज़ुल्म की टक्कर में

Har Zor Zulm Ki Takkar Mein | Shailendra हर ज़ोर-ज़ुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है! तुमने माँगे ठुकरायी हैं, तुमने तोड़ा है हर वादा छीनी हमसे...
Madan Daga

रेखांकित हक़ीक़त

किसने कह दिया तुम्हें कि मैं कविता लिखता हूँ मैं कविता नहीं लिखता मैंने तो सिर्फ़ जन-मन के दर्द के नीचे एक रेखा खींच दी है हाँ, दर्द के नीचे फ़क़त...
Sarveshwar Dayal Saxena

देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता

यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रही...
Fist, Protest, Dissent

आज़ाद कवि

अपराधी-सा जब उन्हें पकड़ा गया वो हमेशा की तरह अपने कामों में व्यस्त थे, लहूलुहान जंगल और नदी के ज़ख़्मों पर मलहम लगा फूलों को सुरक्षित करने के...
Balli Singh Cheema

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के। अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के। कह रही है झोंपड़ी औ' पूछते हैं खेत भी कब...
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