सहजता से कहे गए शब्दों के अर्थ अक्सर चेष्टापूर्ण और कठिन होते हैं जैसे तुमने कहा कि तुम्हें मेरा मौन काटता है और उससे भी ज़्यादा बस चुप रहकर तुम्हें देखते रहना। मेरे मौन में तुम आँक नहीं पाती हो मेरी सम्यक् सम्वेदनाएँ। दरअसल मेरी निजता से तुम्हें चिढ़ हुआ करती है। मैं तुम्हें देखने के लिए और सिर्फ़ देखते रहने के लिए अपने मौन के पूर्वाग्रह से बंधा हुआ हूँ।

देखना जितनी एक साधारण भौतिक अनुभूति है, उतना ही एक दुर्लभ आध्यात्मिक प्रयोग भी। मैं तुम्हें देखते हुए भौतिकताओं में नहीं बांधना चाहता। तुम मेरी निजता में भी उतनी ही पैठ बनाए रखती हो। कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा। मैं तुमसे कभी नहीं मिला। इसके बावजूद तुम मेरी चेतना में उपस्थित हो, यह एक अप्रामाणिक विस्मय के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

देखने के बाद मानने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मान ही लेना पड़ता है। विपश्यना अपूर्व है। जितने व्यक्ति विपश्यना से बुद्धत्व को प्राप्त हुए, उतना और किसी जीवन प्रयोग से नहीं। विपश्यना का अर्थ है देखना, लौटकर देखना। विपश्यना सम्यक् ज्ञान है। जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देख-समझकर जो आचरण होगा, वही सही और कल्याणकारी सम्यक् आचरण होगा। विपश्यना इसी क्षण में यानी तत्काल में जीने की कला है। ऐसा ओशो कहते हैं।

मेरा दृष्टिबोध इसी विपश्यना से जुड़ा है। तुम मेरा तात्कालिक बुद्धत्व हो। मेरे वर्तमान का तुम्हारे वर्तमान से जुड़ना ज़रूरी है, बाक़ी सारा जुड़ाव अन्तर्सामयिक है। यह एक तरह का सन्तुलन है जो मुझे या तुम्हें एक-दूसरे से आगे-पीछे नहीं रहने देता। दोनों को या तो एक ही नियत त्वरण देता है या एक ही जड़त्व। यदि ऐसा नहीं होता तो किसी भी शब्दकोश में ऐसे शब्द नहीं होते जो दो अलग भौतिक सम्भावनाओं को एक-दूसरे से जोड़ते।

समय एक ऐसी कड़ी है जो मुझे तुमसे अलग करती है लेकिन तुम मेरी चेतना में सिद्ध हो। तुम्हें देखा और मान लिया। इसके लिए और कोई प्रमाण नहीं चाहिए। बुद्ध कहते हैं कि तुम अगर चेष्टा करके श्वास को किसी तरह नियोजित करोगे, तो चेष्टा से कभी भी महत फल नहीं प्राप्त होता। चेष्टा तुम्हारी है, तुम ही छोटे हो; तुम्हारी चेष्टा तुमसे बड़ी नहीं हो सकती। तुम्हारे हाथ छोटे हैं; तुम्हारे हाथ की जहाँ-जहाँ छाप होगी, वहाँ-वहाँ छोटापन होगा।

मैं इसीलिए तुम्हें किसी भी चेष्टा से नहीं बांधना चाहता। सहजता मेरा मौन बिगाड़ देगी। मैं सहज नहीं हूँ, न ही बन सकता हूँ। मेरा मौन भी सहज नहीं है लेकिन तुम मेरे लिए सहज हो जैसे साँस लेना सहज होता है। साँस को देख पाना सहज नहीं होता। मौन तुम तक पहुँचने का एक माध्यम है जहाँ बार-बार लौटकर मैं तुम्हें देख सकता हूँ।

आदर्श भूषण की कविता 'मनुष्यता की होड़'

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