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बिंदा
"माँ तुम कभी तारा न बनना, चाहे भगवान कितना ही चमकीला तारा बनावें। नहीं तो, पंडिताइन चाची जैसी नई अम्मा पालकी में बैठकर आ जाएगी और फिर मेरा दूध, बिस्कुट, जलेबी सब बंद हो जाएगी - और मुझे बिंदा बनना पड़ेगा।”
महादेवी वर्मा अपनी कविताओं के लिए ज्यादा जानी जाती हैं लेकिन उनकी कहानियाँ भी पाठकों को कम चकित नहीं करतीं.. महादेवी के गद्य कार्य में 'मेरा परिवार' जैसी कहानियाँ पूरे हिन्दी साहित्य में कहीं नहीं मिलतीं.. जिसमें लार्जर देन लाइफ 'चरित्रों' से हटकर पशु-पक्षियों की अठखेलियों में एक व्यापक विश्व दृष्टि के दर्शन होते हैं.. आज पढ़िए यह कहानी जिसमें 'बिंदा' आपके हृदय को व्याकुल कर देने को आतुर है..!
पासंग
"औरत क्यों हमेशा अपने को निछावर करने के लिए और गठाने के लिए आतुर रहती है? बूढ़ी औरत जो खुद ठगी जाती है फिर वह क्यों नई थिरकती बच्ची को थिरकने से रोक नहीं पाती है? खुद सुधबुध क्यों खो देती है? माँ बनने के सुख के अलावा पुरुष से कभी कुछ नहीं मिला? युगों से खुद लुटती रही और अपनी नई पीढ़ी को लुटने के लिये प्रेरित करती है, ऐसा क्यों? अल्लाह ने औरत को इतना नासमझ-भाग्यहीन क्यों बनाया? इसीलिए तो पुरुष कहता है कि औरत में अकल नहीं होती। अकल होती तो बलि का बकरा बनने को हमेशा आतुर क्यों रहती?"
बे परों की तितली
ये झाड़न की मिट्टी से
मैं गिर रही हूँ
ये पंखे की घूं-घूं में
मैं घूमती हूँ
ये सालन की ख़ुशबू पे
मैं झूमती हूँ
मैं बेलन से चकले पे
बेली...
अपत्नी
"वह हमेशा पैर चौड़े करके बैठती थी, हालांकि उसके एक भी बच्चा नहीं हुआ था। उसके चेहरे की बेफिक्री मुझे नापसंद थी। उसे बेफिक्र होने का कोई हक नहीं था। अभी तो पहली पत्नी से प्रबोध को तलाक भी नहीं मिला था। और फिर प्रबोध को दूसरी शादी की कोई जल्दी भी नहीं थी। मेरी समझ में लड़की को चिन्तित होने के लिये यह पर्याप्त कारण था।"
एक 'योग्य पत्नी' के गुण भारतीय समाज में एक लड़की को बचपन से ही सिखाने शुरू कर दिए जाते हैं.. और वो भी इतना ठूसकर कि एक स्त्री इन गुणों के अभाव में दूसरी स्त्रियों के बारे में ही गलत राय बनाने लगती है.. पढ़िए 'पत्नी' और तथाकथित 'अपत्नी' के अंतर और उसके पीछे की सोच को दिखाती ममता कालिया की यह कहानी!
चार दीवारी में चुनी हुई औरत
बंद के उस तरफ़ ख़ुद उगी झाड़ियों में लगी रस भरी बेरियाँ ख़ूब तैयार हैं
पर मेरे वास्ते उनको दामन में भर लेना मुमकिन नहीं
ऐ...
इज़्ज़त बरक़रार रहती है!
उसने मुझसे कहा कि मैं तुमसे 'प्रेम' करता हूँ
ये भी कहा कि मैं अपनी पत्नी की 'इज़्ज़त' करता हूँ
जब उसके शरीर से बह रहा...
शायरा
मेरे होने की वारदात को
पेज थ्री की रंगीन
सुर्खियों की तरह पढ़ा जाता है
मेरी शख़्सियत का सुडोल होना ज़रूरी है
और जिस्म की तराश का भी
घनी...
तुम्हारे बस में ये कब है
तुम
हमारी लिखने वाली उँगलियों की
शमएँ गुल कर दो
हमारे लफ़्ज़
दीवारों में चुनवा दो
हमारे नाम के उपले बनाओ
अपनी दीवारों पे थोपो
अपने चूल्हों में जला दो
सब तुम्हारे...
भाभी
भाभी ब्याह कर आई थी तो मुश्किल से पंद्रह बरस की होगी। बढवार भी तो पूरी नहीं हुई थी। भैया की सूरत से ऐसी...
मेरी हस्ती मेरा नील कमल
मेरे ख़्वाब जज़ीरे के अंदर
इक झील थी निथरे पानी की
इस झील किनारे पर सुन्दर
इक नील कमल जो खिलता था
इस नील कमल के पहलू में
इक...
ग्लोबल वॉर्मिंग
मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है
साँस खींचती हूँ
तो खिंची चली आती है
कई टूटे तारों की राख
जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ
साँस...
लड़की (क़ंदील बलोच के नाम)
पतले नंगे तार से लटकी
जलती, बुझती, बटती
वो लड़की
जो तुम्हारी धमकी से नहीं डरती
वो लड़की
जिसकी मांग टेढ़ी है
अंधी तन्क़ीद की कंघी
से नहीं सुलझती
वो लड़की
जिसकी हर...









