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तुम्हारा मुझे चाँद कहना
तुम्हारा मुझे चाँद कहना
मजबूर करता है मुझे
सुंदर परिधानों, आभूषणों व शृंगार से ढँके रहने को..
एक औरत तीन बटा चार
स्त्रियाँ घर से बाहर कहीं भी जाएँ, बच्चे और पति के स्कूल और ऑफिस से आने से पहले ही घर पर आ जाती हैं.. और यह समाज यही अपेक्षा उनसे करता भी आया है, यह बिना सोचे समझे कि उनकी एक अलग ज़िन्दगी है, उनके कुछ चाव हो सकते हैं, सहेलियां हो सकती हैं.. पुरुष अपने घर के काम अपने आउटिंग प्लान्स के चलते टाल देता है, लेकिन स्त्री अगर यही करे तो कह दिया जाता है कि उसका घर की तरफ ध्यान नहीं है!
सुधा अरोड़ा इस कहानी में यही हमें बताने की कोशिश कर रही हैं कि कैसे हमने स्त्रियों का एक हिस्सा घर में क़ैद कर रखा है और कैसे ज़िन्दगी के अलग-अलग रूपों की धूप और पानी के बिना वह हिस्सा निर्जीव होने लगता है.. ज़रूर पढ़िए!
मरने की फुर्सत
ईसा मसीह
औरत नहीं थे
वरना मासिक धर्म
ग्यारह बरस की उमर से
उनको ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर!
वेथलेहम और यरूजलम के बीच
कठिन सफर में उनके
हो जाते कई...
मेरे जैसी औरतें
अनुवाद: पुनीत कुसुम
मेरे जैसी औरतें
बोलना नहीं जानतीं
एक शब्द उनके गले में चुभता है
उस काँटे की तरह
जिसे वे निगलना चाहती हैं
मेरे जैसी औरतें
विलाप के अलावा...
तुझे लगता है मुझे होश है, मैं ज़िंदा हूँ?
तुझे लगता है मुझे होश है, मैं ज़िंदा हूँ?
सामने आएगा तो मरता हुआ पायेगा मुझे
सेज फूलों से नहीं 'कै' से भरी होगी मेरी
और उस...
मन का पुरुष
"मेरे पति सब कुछ थे... पर वे मेरे कल्पना के आदमी, मेरे मन के पुरुष नहीं थे...।"
होली
पुरुष के लिए सही गलत की परिभाषा यही रही है कि जो वह करे, वह सही और जो उसे न करने दिया जाए, वह गलत.. और उसके लिए स्त्री ने केवल उसका कहा मानने के लिए ही जन्म लिया है.. ऐसे में स्त्री खुद्दार होने के बावजूद यदि आर्थिक रूप से अपने पति पर निर्भर हो तो उसकी स्थिति इस कहानी की 'करुणा' जैसी ही हो जाती है! पढ़िए सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानी 'होली'!
एक स्त्री के कारनामे
जब आप अपने पति से पूछती हैं कि क्या वो चाय पियेंगे? तो क्या उनका जवाब होता है?- 'पी लूँगा!'
या
जब आपकी पत्नी आपसे बातें करने के लिए कहती हैं तो क्या बात करनी है, क्या यह भी आप उन्हीं से पूछते हैं?
यदि हाँ, तो यह कहानी आपके लिए है! :)
#धो_डाला
आदत
'Aadat', a poem by Archana Verma
मरदों ने घर को
लौटने का पर्याय बना लिया
और लौटने को मर जाने का
घर को फिर उन्होंने देखा ही नहीं
लौटकर...
यतीम औलादें
मैं कुछ यतीम बच्चों को जानती हूँ
जिनके वालिदैन ज़िंदा हैं, उनके साथ रहते हैं
पर वो शजर नहीं बन सके अपनी औलाद के लिए
और बने...
चकरघिन्नी
तीन तलाक़ एक बड़ा सामाजिक मुद्दा है.. और अब तो राजनीतिक भी! साहित्यकारों की संवेदनाएं भी इससे अछूती नहीं रही हैं.. जिन लोगों के लिए यह विषय एक अनजान दायरे में पड़ता है, उन्हें नूर ज़हीर की यह कहानी 'चकरघिन्नी' ज़रूर पढ़नी चाहिए, जो हमें इस विषय की गंभीरता और क्रूरता दोनों से अवगत कराती है!
नीच
"हाँ वो क्यों नहीं करेंगे, नीच जात जो ठहरे!"
ये वाक्य हमारे रोज़मर्रा के जीवन में आज भी सुनने को मिलते हैं.. जो हमसे हमारी तथाकथित जाति में नीचे हैं, उनसे हमें किसी भी सलीके के काम की उम्मीद नहीं होती.. हम उनकी प्रगति और अच्छे व्यवहार को देखते हैं लेकिन फिर भी यह वाक्य कहने का मौका ढूँढते रहते हैं..
सुल्ताना और शामली की यह कहानी भी हमारी सोच के इसी उतार-चढ़ाव की कहानी है.. पढ़िए!











