Tag: Grief

Nitesh Vyas

कविताएँ – मई 2020

चार चौक सोलह उन्होंने न जाने कितनी योनियाँ पार करके पायी थी दुर्लभ मनुष्य देह पर उन्हें क्या पता था कि एक योनि से दूसरी योनि में पहुँचने के कालान्तर से...
Kamleshwar

चप्पल

कहानी बहुत छोटी-सी है। मुझे ऑल इण्डिया मेडिकल इंस्टीटयूट की सातवीं मंज़िल पर जाना था। आई०सी०यू० में गाड़ी पार्क करके चला तो मन बहुत...
Trilochan

हम दोनों हैं दुःखी

हम दोनो हैं दुःखी। पास ही नीरव बैठें, बोलें नहीं, न छुएँ। समय चुपचाप बिताएँ, अपने-अपने मन में भटक-भटककर पैठें उस दुःख के सागर में, जिसके तीर...
Evil, Bad, Hands

दुःख का निरस्तीकरण

वो दुःखी था क्योंकि उसने दुःख का निरस्तीकरण अभी तक देखा नहीं थावो दुःख जो ग़रीब माँ के पेट से जन्म लेता है, हर बार जिसके...
Eye, Wall Art, Grief, Sadness

आश्रय

'Ashraya', Hindi Kavita by Rashmi Saxenaनमी खोखला कर देती है भीतर तक, दीवार की हो काठ की हो अथवा हो आत्मा कीमन की दीवार पर दुःख द्वारा लगायी सेंध से रिसता...
Leaf painting on Woman's Back, Sad, Depression, Hopeless

अवसाद

अवसाद के लिए दुनिया में कितनी जगह थी पर उसने चुनी मेरे भीतर की रिक्ततामेरे भीतर के दृश्य को देखने वाला कोई नहीं था आख़िर नीले आसमान...

दुःख

'Dukh', a poem by Amar Dalpuraनदियों का अपना दुःख है औरतों का अपना, वे कल-कल बहती हैं कल-कल में सूखती हैंउसे कल का संगीत और कल का समय अन्तःप्रवाही...
Manjula Bist

‘पीड़ा ही याद रही’ – दो कविताएँ

Poems: Manjula Bist 1 पीड़ा ही याद रही...जिनमें भी सौन्दर्य था वे नश्वर सिद्ध थे पीड़ाओं में कभी सौन्दर्यबोध न था सो वे अमर हैं!इसीलिये ही तो सारी तितलियों के...
Prabhat Milind

क़िस्से से बाहर होने का दुःख

'Qisse Se Bahar Hone Ka Dukh', Hindi Kavita by Prabhat Milindजो कभी व्यक्त नहीं हो पाया दुःख से बड़ा दुःख, यही दुःख थाअब तलक दिखने...
Rituraj

माँ का दुःख

कितना प्रामाणिक था उसका दुःख लड़की को दान में देते वक्त जैसे वही उसकी अन्तिम पूँजी होलड़की अभी सयानी नहीं थी अभी इतनी भोली सरल थी कि उसे सुख...
Harshita Panchariya

दुःख के दुःख की पीड़ा

'Dukh Ke Dukh Ki Peeda', poetry by Harshita Panchariyaसुख की देह जितनी सूक्ष्म है उतना ही दुःख देह पर देह लिए औंधा लटका रहता है जैसे ही एक...
Sadness, Grief, Painting, Woman

दुःख के दिन की कविता

'Dukh Ke Din Ki Kavita', poems by Santwana Shrikantमारे जाते हैं सपने बची रह जाती है परम्परा। वध होता है जिजीविषा का ढोती रहती हैं सभ्यताएँ यह दुःख। सदियों तक सलीब ढोता...

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स्वीडिश कवि मैगनस ग्रेन की कविताएँ

अनुवाद: पंखुरी सिन्हा आंधी के बाद सेंट फ़ेगंस जाने की राह में एम 4 पर हमारी गाड़ी दौड़ गई वेल्स के बीचों-बीच सेंट फ़ेगंस की ओर आंधी के बाद...
Naomi Shihab Nye

नेओमी शिहैब नाय की कविता ‘प्रसिद्ध’

नेओमी शिहैब नाय (Naomi Shihab Nye) का जन्म सेंट लुइस, मिसौरी में हुआ था। उनके पिता एक फ़िलिस्तीनी शरणार्थी थे और उनकी माँ जर्मन...
Shehar Se Dus Kilometer - Nilesh Raghuwanshi

किताब अंश: ‘शहर से दस किलोमीटर’ – नीलेश रघुवंशी

'शहर से दस किलोमीटर' ही वह दुनिया बसती है जो शहरों की न कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने...
Shri Vilas Singh

श्रीविलास सिंह की कविताएँ

सड़कें कहीं नहीं जातीं सड़कें कहीं नहीं जातीं वे बस करती हैं दूरियों के बीच सेतु का काम, दो बिंदुओं को जोड़तीं रेखाओं की तरह, फिर भी वे पहुँचा देती...
Ret Samadhi - Geetanjali Shree

गीतांजलि श्री – ‘रेत समाधि’

गीतांजलि श्री का उपन्यास 'रेत समाधि' हाल ही में इस साल के लिए दिए जाने वाले बुकर प्राइज़ के लिए चयनित अन्तिम छः किताबों...
Tom Phillips

टॉम फ़िलिप्स की कविताएँ

अनुवाद: पंखुरी सिन्हा युद्ध के बाद ज़िन्दगी कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं बग़ीचे की झाड़ियाँ हिलाती हैं अपनी दाढ़ियाँ बहस करते दार्शनिकों की तरह जबकि पैशन फ़्रूट की नारंगी मुठ्ठियाँ जा...
Javed Alam Khan

जावेद आलम ख़ान की कविताएँ

तुम देखना चांद तुम देखना चांद एक दिन कविताओं से उठा ज्वार अपने साथ बहा ले जाएगा दुनिया का तमाम बारूद सड़कों पर क़दमताल करते बच्चे हथियारों को दफ़न...
Shyam Bihari Shyamal - Sangita Paul - Kantha

श्यामबिहारी श्यामल जी के साथ संगीता पॉल की बातचीत

जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित उपन्यास 'कंथा' का साहित्यिक-जगत में व्यापक स्वागत हुआ है। लेखक श्यामबिहारी श्यामल से उपन्यास की रचना-प्रकिया, प्रसाद जी...
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किताब अंश: शाहीन बाग़ – लोकतंत्र की नई करवट

भाषा सिंह की किताब 'शाहीन बाग़ : लोकतंत्र की नई करवट' उस अनूठे आन्दोलन का दस्तावेज़ है जो राजधानी दिल्ली के गुमनाम-से इलाक़े से...
Woman with dupatta

सहेजने की आनुवांशिकता में

कहीं न पहुँचने की निरर्थकता में हम हमेशा स्वयं को चलते हुए पाते हैं जानते हुए कि चलना एक भ्रम है और कहीं न पहुँचना यथार्थदिशाओं के...
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