Tag: राजनीति

Madan Daga

कुर्सी-प्रधान देश

पहले लोग सठिया जाते थे अब कुर्सिया जाते हैं!दोस्त मेरे! भारत एक कृषि-प्रधान नहीं कुर्सी-प्रधान देश है!हमारे संसद-भवन के द्वार में कुछ स्प्रिगें ही ऐसी लगी हैं कि समाजवादी...
Sharad Joshi

एक भूतपूर्व मंत्री से मुलाक़ात

मंत्री थे तब उनके दरवाज़े कार बँधी रहती थी। आजकल क्वार्टर में रहते हैं और दरवाज़े भैंस बँधी रहती है। मैं जब उनके यहाँ...
Gaurav Bharti

कविताएँ: जुलाई 2020 (द्वितीय)

पिता इस साल जनवरी में नहीं रहे मेरे पिता के पिताउनके जाने के बाद इन दिनों पिता के चेहरे को देखकर समझ रहा हूँ पिता के जाने का दुःखदुःख,...
Vijaydev Narayan Sahi

सवाल है कि असली सवाल क्या है

असली सवाल है कि मुख्यमन्त्री कौन होगा? नहीं नहीं, असली सवाल है कि ठाकुरों को इस बार कितने टिकट मिले? नहीं नहीं, असली सवाल है कि ज़िले से...
Keshav Sharan

कविताएँ: अगस्त 2020

व्यापार और प्यार: एक गणित यह जो हम लेते हैं यह जो हम देते हैं व्यापार है इसमें से घटा दो अगर लाभ-हानि का जो विचार है तो बाक़ी बचा प्यार है!फिर प्यार में जोड़...
Shrikant Verma

हस्तक्षेप

कोई छींकता तक नहीं इस डर से कि मगध की शांति भंग न हो जाए, मगध को बनाए रखना है तो मगध में शांति रहनी ही चाहिएमगध है, तो शांति...
Manjula Bist

सिर्फ़ व सिर्फ़ अपने बारे में

पागल स्त्री की चीख़ पर कोई कान नहीं दे रहा है भटकते लोगों की बड़बड़ाहट का कोई अर्थ नहीं है संततियाँ पालकों से अधिक ऐप में...
Adarsh Bhushan

अमलदारी

इससे पहले कि अक्षुण्णताओं के रेखाचित्र ढोते अभिलेखागारों के दस्तावेज़ों में उलटफेर कर दी जाए, उन सारी जगहों की शिनाख़्त होनी चाहिए जहाँ बैठकर एक कुशल और समृद्ध समाज की कल्पनाओं के...
Shail Chaturvedi

मूल अधिकार?

क्या कहा—चुनाव आ रहा है? तो खड़े हो जाइए देश थोड़ा बहुत बचा है उसे आप खाइए। देखिए न, लोग किस तरह खा रहे हैं सड़के, पुल और फ़ैक्ट्रियों तक को पचा...
Gorakh Pandey

संसद का गीत

सावधान! संसद है, बहस चल रही है!भीतर कुछ कुर्सियाँ मँगाओ बाहर जेलें नयी बनाओ बाँधो लपटें झोपड़ियों की महलों की रौनक़ें बचाओ खलबली मची है जंगल में आग जल रही है...
Pandey Bechan Sharma Ugra

उसकी माँ

दोपहर को ज़रा आराम करके उठा था। अपने पढ़ने-लिखने के कमरे में खड़ा-खड़ा धीरे-धीरे सिगार पी रहा था और बड़ी-बड़ी अलमारियों में सजे पुस्तकालय...

मदारी का लोकतन्त्र

वो किसी धूर्त मदारी की तरह वादों की डुगडुगी बजाते हुए पीटते हैं ताली, टटोलते हैं हमारी जेबें, तोड़ते हैं आज़ाद क़लमें, जाँचते हैं हमारे शब्द, सूँघते हैं हमारी थालियाँ, बाँटते हैं हमारे त्यौहार, बदल देते हैं इतिहास की किताब, गिनते हैं...

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अनुवाद: पंखुरी सिन्हा आंधी के बाद सेंट फ़ेगंस जाने की राह में एम 4 पर हमारी गाड़ी दौड़ गई वेल्स के बीचों-बीच सेंट फ़ेगंस की ओर आंधी के बाद...
Naomi Shihab Nye

नेओमी शिहैब नाय की कविता ‘प्रसिद्ध’

नेओमी शिहैब नाय (Naomi Shihab Nye) का जन्म सेंट लुइस, मिसौरी में हुआ था। उनके पिता एक फ़िलिस्तीनी शरणार्थी थे और उनकी माँ जर्मन...
Shehar Se Dus Kilometer - Nilesh Raghuwanshi

किताब अंश: ‘शहर से दस किलोमीटर’ – नीलेश रघुवंशी

'शहर से दस किलोमीटर' ही वह दुनिया बसती है जो शहरों की न कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने...
Shri Vilas Singh

श्रीविलास सिंह की कविताएँ

सड़कें कहीं नहीं जातीं सड़कें कहीं नहीं जातीं वे बस करती हैं दूरियों के बीच सेतु का काम, दो बिंदुओं को जोड़तीं रेखाओं की तरह, फिर भी वे पहुँचा देती...
Ret Samadhi - Geetanjali Shree

गीतांजलि श्री – ‘रेत समाधि’

गीतांजलि श्री का उपन्यास 'रेत समाधि' हाल ही में इस साल के लिए दिए जाने वाले बुकर प्राइज़ के लिए चयनित अन्तिम छः किताबों...
Tom Phillips

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अनुवाद: पंखुरी सिन्हा युद्ध के बाद ज़िन्दगी कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं बग़ीचे की झाड़ियाँ हिलाती हैं अपनी दाढ़ियाँ बहस करते दार्शनिकों की तरह जबकि पैशन फ़्रूट की नारंगी मुठ्ठियाँ जा...
Javed Alam Khan

जावेद आलम ख़ान की कविताएँ

तुम देखना चांद तुम देखना चांद एक दिन कविताओं से उठा ज्वार अपने साथ बहा ले जाएगा दुनिया का तमाम बारूद सड़कों पर क़दमताल करते बच्चे हथियारों को दफ़न...
Shyam Bihari Shyamal - Sangita Paul - Kantha

श्यामबिहारी श्यामल जी के साथ संगीता पॉल की बातचीत

जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित उपन्यास 'कंथा' का साहित्यिक-जगत में व्यापक स्वागत हुआ है। लेखक श्यामबिहारी श्यामल से उपन्यास की रचना-प्रकिया, प्रसाद जी...
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किताब अंश: शाहीन बाग़ – लोकतंत्र की नई करवट

भाषा सिंह की किताब 'शाहीन बाग़ : लोकतंत्र की नई करवट' उस अनूठे आन्दोलन का दस्तावेज़ है जो राजधानी दिल्ली के गुमनाम-से इलाक़े से...
Woman with dupatta

सहेजने की आनुवांशिकता में

कहीं न पहुँचने की निरर्थकता में हम हमेशा स्वयं को चलते हुए पाते हैं जानते हुए कि चलना एक भ्रम है और कहीं न पहुँचना यथार्थदिशाओं के...
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