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Tag: प्रेम
प्यार
इस पेड़ में
कल जहाँ पत्तियाँ थीं
आज वहाँ फूल हैं,
जहाँ फूल थे
वहाँ फल हैं,
जहाँ फल थे
वहाँ संगीत के
तमाम निर्झर झर रहे हैं,
उन निर्झरों में
जहाँ शिलाखण्ड थे
वहाँ चाँद...
अन्तिम प्रेम
हर कुछ कभी न कभी सुन्दर हो जाता है
बसन्त और हमारे बीच अब बेमाप फ़ासला है
तुम पतझड़ के उस पेड़ की तरह सुन्दर हो
जो बिना...
प्रभात की कविताएँ
प्रस्तुति: विजय राही
तुम
तुमने कहना नहीं चाहा
लेकिन कहा
पेड़ से बाँध दो इसे
खाल उधेड़ो इसकी
इच्छा पूरी करो बस्ती की।
बाक़ी मुझे बेच दो
या शादी करो
रहूँगी तो इसी की
कौन...
वो जो कोई थी
वो जो कोई थी
किसी ज़माने में
मेरी उम्र के सफ़ेद और काले पन्नों के बीच
किसी सतरंगी चित्र-सी
जिसका तय था सम्बन्ध
हमारे मिलने के
बहुत पहले से ही,
बनना था...
शहर से गुज़रते हुए प्रेम, कविता पढ़ना, बेबसी
शहर से गुज़रते हुए प्रेम
मैं जब-जब शहर से गुज़रता हूँ
सोचता हूँ
किसने बसाए होंगे शहर?
शायद गाँवों से भागे
प्रेमियों ने शहर बसाए होंगे
ये वो अभागे थे,
जो फिर लौटना...
क्या तुमने, प्रेम एवं विवाह, चरित्रहीन
क्या तुमने
उसकी कमर
टटोलने
से पहले
क्या तुमने
टटोली हैं
उसकी हथेलियाँ?
उसके अधर
चूमने से पहले
क्या तुमने
चूमा है
उसका माथा?
क्या तुमने कभी
उसके सीने को स्पर्श
किए बिना
स्पर्श किया है
उसका हृदय?
प्रेम एवं विवाह
प्रेम...
अश्रु और स्वेद के नामक में है फ़र्क़
प्रिय मिलन की उत्कण्ठा में
दौड़कर पहाड़ लाँघ गयी थी प्रिया,
आपादमस्तक स्वेद से सनी हुई
जब प्रियतम के गले लगी
तब स्वेद की नैसर्गिक गन्ध से
सुवासित हो...
आइसोलेशन में प्रेमिकाएँ
पेड़, नदी, पहाड़ और झरने
प्रेमिकाएँ उन सबसे लेती हैं उधार
एक-एक कटोरी प्रीत
और करघे की खच-खच में बहाती हुई
अपनी निर्झरिणी
वे बुन डालती हैं एक ख़ूबसूरत कालीन
जिसमें मौजूद...
तुम्हारे बग़ैर मैं होता ही नहीं
तुम्हारे बग़ैर मैं बहुत खचाखच रहता हूँ
यह दुनिया सारी धक्कम-पेल सहित
बेघर पाश की दहलीज़ें लाँघकर आती-जाती है
तुम्हारे बग़ैर मैं पूरे का पूरा तूफ़ान होता...
तन के तट पर
तन के तट पर मिले हम कई बार, पर
द्वार मन का अभी तक खुला ही नहीं,
डूबकर गल गए हैं हिमालय, मगर
जल के सीने पे...
पोंछना
ना ठीक-ठीक फूल-सी नाज़ुक
ना ही पत्तियों-सी चंचल
किसी बड़ी बात की तरह भी नहीं,
क्रिया के बाद बची रह गयी
किसी अनन्य क्रिया की तरह है
पोंछने की...
उम्मीद
'Ummeed', a poem by Akhileshwar Pandey
रेत नदी की सहचर है
जो पत्ते चट्टानों पर गिरकर सूख रहे होते हैं
उन्हें अकेलेपन का नहीं,
हरेपन से बिछुड़ने का दुःख सता...











