Tag: प्रेम

Read here the best Hindi Love Poems and Stories

Rakhi Singh

उपहार

'Uphaar', a poem by Rakhi Singh संसार के शब्दकोश के सबसे मधुर शब्दों में शामिल है, उपहार मुझे गुलाब देने या लेने से अधिक रुचि गुलाब का पौधा...
Shahbaz Rizvi

हमारे साथ मुहब्बत का राब्ता कैसा

'Humare Sath Mohabbat Ka Rabta Kaisa', a nazm by Shahbaz Rizvi हमारे साथ मुहब्बत का राब्ता कैसा किसे तलाश समुन्दर में बहती लाशों की कोई नहीं जो सदाओं...
Prabhat Milind

पृथ्वी पर प्रेम के चुनिंदा दावेदार हैं

'Prithvi Par Prem Ke Chuninda Davedar Hain', a poem by Prabhat Milind 1 मनुष्य को घृणा नहीं, प्रेम मारता है घृणा करते हुए हम चौकन्ने रहते हैं लोग...
Rakhi Singh

राखी सिंह की कविताएँ

Poems: Rakhi Singh अलिखित लिपि पानी की लिपि में लिखी थीं मैंने चिट्ठियाँ, किसी शब्दकोश की मदद से कोई उनकी लिखावट पढ़ नहीं पाएगा, नहीं होंगी संरक्षित वो किसी पुस्तकालय...
Palash Ke Phool

पलाश के फूल

'Palash Ke Phool', a poem by Prita Arvind जंगल में पलाश के पेड़ पर फूल लग गए हैं, यह किसी को बताना नहीं पड़ता क्यूंकि पलाश के फूल...
Joshnaa Banerjee Adwanii

आदिवासी प्रेमी युगल

'Adivasi Premi Yugal', a poem by Joshnaa Banerjee Adwanii वो झारखंड ज़िले के संथल से बत्तीस किलोमीटर दूर ऊसर भूमि पर वास करती है आँखों में वहनि-सा तेज सूरत से...
Rahul Boyal

अपील

'Appeal', a poem by Rahul Boyal जज साहब! क्या एक कवि अपनी कविता कह देने के बाद उसे वापस ले सकता है? यूँ तो मैं जानता हूँ कि वाणी...
Chandra Kunwar Bartwal

गुँजन ला

'Gunjan La', a poem by Chandra Kunwar Bartwal तेरा मन मेरा हो जाए, मेरा मन तेरा हो जाए, मैं तेरे मन की बात सुनूँ, तू मेरे...
Trilochan

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार अपरिचित पास आओ! आँखों में सशंक जिज्ञासा मुक्ति कहाँ, है अभी कुहासा जहाँ खड़े हैं, पाँव जड़े हैं स्तम्भ शेष भय की परिभाषा हिलो...
Flower

प्रेम की हत्या

'Prem Ki Hatya', a poem by Rashmi Saxena मरा नहीं था प्रेम अपितु हत्या की गयी थी उसकी एक अंधेरे कमरे में बंद करके कई दिनों तक भूखा...
Poems by Vivek Kumar Jain

तीन कविताएँ

Poems by Vivek Kumar Jain चाहत मुझे नहीं होना बुद्ध न चाहिए प्राप्य मोक्ष मैं बस तुम्हारी देह की छाँव में निरन्तर मनुष्य होना चाहता हूँ, किसी वनमानुष की नाख़ून कुतर इंसान...
Gaurow Gupta

अक्सर तुम कहती थीं

'Aksar Tum Kehti Thi', a poem by Gaurow Gupta अक्सर तुम कहती थीं- "अच्छा होता हम मिले ना होते!" मैं कहता था- "मिलकर... इतना बुरा भी तो नहीं...
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