जो उतरा फिर न उभरा, कह रहा है

जो उतरा फिर न उभरा, कह रहा है ये पानी मुद्दतों से बह रहा है मेरे अन्दर हवस के पत्थरों को कोई दीवाना कब से सह रहा है तकल्लुफ़...

यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं, ख़फ़ा होते हैं

यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं, ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते...

अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है

अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है मगर चराग़ ने लौ को सम्भाल रक्खा है मोहब्बतों में तो मिलना है या उजड़ जाना मिज़ाज-ए-इश्क़ में कब एतिदाल रक्खा...

वही फिर मुझे याद आने लगे हैं

वही फिर मुझे याद आने लगे हैं जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं वो हैं पास और याद आने लगे हैं मोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे...

दुख कहाँ से आ रहे बतलाइए

दुख कहाँ से आ रहे बतलाइए और कब तक जा रहे बतलाइए भूख कब से द्वार पर बैठी हुई आप कब से खा रहे बतलाइए काम से जो...

अच्छा है उनसे कोई तक़ाज़ा किया न जाए

अच्छा है उनसे कोई तक़ाज़ा किया न जाए अपनी नज़र में आप को रुस्वा किया न जाए हम हैं, तेरा ख़याल है, तेरा जमाल है इक पल...

जाने वो कौन था

जाने वो कौन था और किसको सदा देता था उससे बिछड़ा है कोई, इतना पता देता था कोई कुछ पूछे तो कहता कि हवा से बचना ख़ुद...

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है आज कुछ बात है जो...

तेज़ एहसास-ए-ख़ुदी दरकार है

तेज़ एहसास-ए-ख़ुदी दरकार है ज़िन्दगी को ज़िन्दगी दरकार है जो चढ़ा जाए ख़ुमिस्तान-ए-जहाँ हाँ वही लब-तिश्नगी दरकार है देवताओं का ख़ुदा से होगा काम आदमी को आदमी दरकार है सौ गुलिस्ताँ...

तुम कभी थे सूर्य

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गए थे कभी मुख्पृष्ठ पर, अब हाशियों तक आ गए। यवनिका बदली कि सारा दृष्य बदला मंच...

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या-क्या लिख्खा शहर भी लिक्खा, मकाँ लिक्खा, मोहल्ला लिखा हम कहाँ के थे...

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं। अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं। वो सलीबों...
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