फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों

फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों, अफ़्साने हों फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से...

दायरा

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौटके आ जाता हूँ बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर...

घास तो मुझ जैसी है

घास भी मुझ जैसी है पाँव-तले बिछकर ही ज़िन्दगी की मुराद पाती है मगर ये भीगकर किस बात की गवाही बनती है शर्मसारी की आँच की कि जज़्बे की...

ख़ूबसूरत मोड़

'Khoobsurat Mod' - Sahir Ludhianvi चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की न तुम मेरी तरफ़...

मुझसे पूछो

'Mujhse Poochho', a nazm by Tasneef Haidar मुझसे पूछो मेरी सारी उम्र दूसरे लोगों की तक़लीद में गुज़री है हुक्म की इक गहरी तामील में गुज़री है एक लकीर...

वहम

मूल कविता: 'वहम' - विजय राही अनुवाद: असना बद्र जब भी सोचा मौत के बारे में मैंने चंद चेहरे रूबरू से आ गए वो जो करते हैं मोहब्बत बे...

भली-सी एक शक्ल थी

भले दिनों की बात है भली-सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम-सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर...

नया हुक्मनामा

'Naya Hukmnama', a nazm by Javed Akhtar किसी का हुक्म है सारी हवाएँ हमेशा चलने से पहले बताएँ कि उन की सम्त क्या है किधर जा रही हैं हवाओं...

मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़

हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म...

औरतो! रास्ता दिखाओ हमें

औरतो! रास्ता दिखाओ हमें हम जिन्हें नफ़रतों के मौसम में मौत की फ़स्ल बोना आती है हम जिन्हें आँधियों के आँगन में अपनी हर शम'अ खोना आती है सरहदों,...

सुना है

सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है सुना है शेर का जब पेट भर जाए तो वो हमला नहीं करता दरख़्तों की घनी छाँव...

कोई ये कैसे बताए

'Koi Yeh Kaise Bataye', by Kaifi Azmi कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है यही...
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