टारगेट किलिंग
चूड़ी वाले के यहाँ
मैं अभी स्टूल पर बैठी ही थी
साथ की दुकान के आगे इक स्कूटर रुका
गोली चली
सब ने फ़क़ चेहरों के साथ
मुड़के देखा
एक लम्हे...
इतना मालूम है
अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़
सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगा
मैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू में
रोज़ की तरह...
कभी-कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
कभी-कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िन्दगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मिरी...
आख़िरी दिन की तलाश
ख़ुदा ने क़ुरआन में कहा है
कि लोगो मैंने
तुम्हारी ख़ातिर
फ़लक बनाया
फ़लक को तारों से
चाँद-सूरज से जगमगाया
कि लोगो मैंने
तुम्हारी ख़ातिर
ज़मीं बनायी
ज़मीं के सीने पे
नदियों की लकीरें...
एक दरख़्वास्त
ज़िन्दगी के जितने दरवाज़े हैं, मुझ पे बंद हैं
देखना— हद्द-ए-नज़र से आगे बढ़कर देखना भी जुर्म है
सोचना— अपने अक़ीदों और यक़ीनों से निकलकर सोचना...
वक़्त के कटहरे में
सुनो तुम्हारा जुर्म तुम्हारी कमज़ोरी है
अपने जुर्म पे
रंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बेजान रिदाएँ मत डालो
सुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैं
तुम ख़्वाबों की ताबीर से...
दावतों में शाइरी
दावतों में शाइरी अब हो गई है रस्म-ए-आम
यूँ भी शाइर से लिया जाता है अक्सर इंतिक़ाम
पहले खाना उसको खिलवाते हैं भूखे की तरह
फिर उसे करते...
















