इश्क़बाज़ टिड्डा
हज़ारों लाखों नन्ही सी जान के कीड़ों पतिगों में टिड्डा एक बड़े जिस्म और बड़ी जान का इश्क़बाज़ है और परवाने आते हैं तो...
क्रमशः प्रगति
"खरगोश का एक जोड़ा था, जिनके पाँच बच्चे थे।
एक दिन भेड़िया जीप में बैठकर आया और बोला - 'असामाजिक तत्त्वों तुम्हें पता नहीं सरकार ने तीन बच्चों का लक्ष्य रखा है।' और दो बच्चे कम करके चला गया।"
प्यारी डकार
"चाहता ये हूँ कि अपने तूफ़ानी पेट के बादलों को हल्क़ में बुलाऊँ और पूरी गरज के साथ बाहर बरसाऊँ। यानी कड़ाके दार डकार लूँ। पर क्या करूँ ये नए फ़ैशन वाले मुझको ज़ोर से डकार लेने नहीं देते। कहते हैं डकार आने लगे तो होंटों को भीच लो और नाक के नथुनों से उसे चुपचाप उड़ा दो। आवाज़ से डकार लेनी बड़ी बे-तहज़ीबी है।"
भेड़-भेड़िये, भाई-भाई!
'भेड़-भेड़िये, भाई-भाई!' - रामनारायण उपाध्याय
बोले - कहानी कहो।
कहा - कहानी सुनो, एक था राजा।
बोले - राजाओं की कहानी हमें नहीं सुननी है, वे...
हमारा मुल्क
किताब अंश: 'उर्दू की आख़िरी किताब' - इब्ने इंशा
"ईरान में कौन रहता है?"
"ईरान में ईरानी क़ौम रहती है।"
"इंग्लिस्तान में कौन रहता है?"
"इंग्लिस्तान में अंग्रेज़ी...
अतिथि! तुम कब जाओगे
"यह सच है कि अतिथि होने के नाते तुम देवता हो, मगर मैं भी आखिर मनुष्य हूँ। एक मनुष्य ज्यादा दिनों देवता के साथ नहीं रह सकता। देवता का काम है कि वह दर्शन दे और लौट जाए। तुम लौट जाओ अतिथि। इसके पूर्व कि मैं अपनी वाली पर उतरूँ, तुम लौट जाओ।"
आलस्य-भक्त
"मनुष्य-शरीर आलस्य के लिए ही बना है। यदि ऐसा न होता, तो मानव-शिशु भी जन्म से मृग-शावक की भांति छलांगें मारने लगता, किंतु प्रकृति की शिक्षा को कौन मानता है। मनुष्य ही को ईश्वर ने पूर्ण आराम के लिए बनाया है। उसी की पीठ खाट के उपयुक्त चौड़ी बनाई है, जो ठीक उसी से मिल जावे। मनुष्य चाहे पेट की सीमा से भी अधिक भोजन कर ले, उसके आराम के अर्थ पीठ मौजूद है। ईश्वर ने तो हमारे आराम की पहले ही से व्यवस्था कर दी है। हम ही उसका पूर्ण उपयोग नहीं कर रहे हैं।"
प्रोपगंडा-प्रभु का प्रताप
(In collaboration with Acharya Shivpoojan Sahay Smarak Nyas)
'प्रोपगंडा'-प्रभु का प्रताप प्रचंड है - 'जिन्हके जस-प्रताप के आगे, ससि मलीन रवि सीतल लागे।' यदि आज...
हिन्दी की आखिरी किताब
"आलोचक : वह असफल लेखक जो किसी भी लेखक को सफल होते नहीं देखना चाहता, आलोचक कहलाता है। वैसे आलोचक खटमलों की तरी लेखक का खून चूस चूसकर मोटाता है।"
भोलाराम का जीव
'रिटायर्ड' हो चुके भोलाराम ज़िन्दगी से भी रिटायर हो गए हैं लेकिन उनका जीव (आत्मा) यमदूत को चकमा देकर कहीं भाग गया है। नारद मुनि उसकी खोज में निकलते हैं तो अपनी वीणा तक से हाथ धोने के बाद उस जीव को एक ऐसी जगह पाते हैं जो उम्मीद से बाहर थी। कहाँ मिलता है भोलाराम का जीव, जानने के लिए पढ़िए हरिशंकर परसाई का यह व्यंग्य!
"महाराज, आजकल पृथ्वी पर इसका व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को फल भेजते है, और वे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा देते हैं। होज़री के पार्सलों के मोज़े रेलवे आफिसर पहनते हैं। मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं।"














