‘साइकिल’ – बच्चों का दुमहिया

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक पोस्ट देखी थी जिसका इशारा इस तरफ था कि जिन विद्यार्थियों ने अपने सम्पूर्ण शैक्षिक जीवन में कभी...

ठेठ हिन्दी

"प्रत्येक तत्सम शब्द उधार लिया हुआ है। यह उधार हिन्दी को अपनी दादी (संस्कृत) से लेना पड़ता है। यदि मैं अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों से प्रायः ऋण लेने की आदत डालूँ तो मैं विनष्ट हो जाऊँगा।"

बोलचाल की भाषा

बोलचाल की भाषा के बारे में कुछ लिखना टेढ़ी खीर है। जितने मुँह उतनी बात सुनी जाती है। यदि यह बात सत्य न हो...

प्राचीन काल के भयंकर जन्तु

प्राणिविद्या, भूगर्भविद्या, खनिजविद्या, कीट-पतङ्गविद्या आदि जितनी प्राकृतिक विद्यायें हैं उनका अध्ययन करने के लिए प्रत्यक्ष अनुभव की बड़ी आवश्यकता होती है। केवल पुस्तकों के...

समझौते का कोई प्रश्न ही नहीं

यूरोपीय युद्ध के सन्दर्भ में अहिंसा के महत्त्व पर पूछे गए सवालों के जवाब के रूप में महात्मा गाँधी के लेख 'युद्ध और अहिंसा' किताब में संकलित किए गए हैं.. उन्हीं में से एक लेख प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने हिटलर को लिखे गए अपने ख़त के बारे में भी ज़िक्र किया है...

भेड़ियों की माँद में पली हुई लड़कियाँ

जंगल बुक का मोगली हमारे लिए एक काल्पनिक किरदार रहा है, लेकिन 1928 के लगभग लिखा गया महावीर प्रसाद द्विवेदी का यह लेख, मोगली जैसे बच्चों के अस्तित्व और कहानी के प्रमाण देता है.. जिसमें बच्चे, ख़ास तौर से लड़कियाँ भेड़ियों के संरक्षण में रहा करती थीं.. पढ़िए! :)

आज बात करते हैं ‘तख़ल्लुस’ की..

आज बात करते हैं 'तख़ल्लुस' की - तसनीफ़ हैदर तख़ल्लुस असल में ऐसे नाम को कहते हैं जिसे शायर अपनी ग़ज़ल के मक़्ते (आख़री शेर)...

‘हिंदीनामा’ के बारे में

'हिंदीनामा' के बारे में फेसबुक पेज 'हिंदीनामा' एक और प्रयास है हिन्दी के लेखकों/कवियों को एक दूसरे के और इस संसार के सामने लाने का!...

सरस्वती के आविर्भाव के समय हिन्दी की अवस्था

'सरस्वती के आविर्भाव के समय हिन्दी की अवस्था' - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी जिन मुसलमान आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण कर उसका शासन अनेक वर्षों तक...

काजी नजरुल इस्लाम

काजी नजरुल इस्लाम - संजय कृष्ण चुरुलिया गांव का तालाब वैसे ही था, जैसे काजी नजरूल इस्लाम के समय में था। सौ सालों में कोई...

अद्भुत मक्खियाँ

"एक मक्खी की दस पीढ़ियों की सब मक्खियाँ यदि इकट्ठी की जा सकें तो उन सबका वज़न इतना होगा जितना कि साढ़े तीन मन के वज़न वाले 50 करोड़ मनुष्यों का होता है। इस बढ़ती का कुछ ठिकाना है!"
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