मैं और तू

ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि मैं तुझसे नज़रें मिलाऊँ तिरी शान में कुछ कहूँ तुझे अपनी नज़रों से नीचे गिराऊँ ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि...

मेले

बाप की उँगली थामे इक नन्हा-सा बच्चा पहले-पहल मेले में गया तो अपनी भोली-भाली कंचों जैसी आँखों से इक दुनिया देखी ये क्या है और वो क्या है सब उसने पूछा बाप...

ख़्वाबों के ब्योपारी

हम ख़्वाबों के ब्योपारी थे पर इसमें हुआ नुक़सान बड़ा कुछ बख़्त में ढेरों कालक थी कुछ अब के ग़ज़ब का काल पड़ा हम राख लिए हैं झोली...

मेनोपॉज़

अजीब-सी इत्तिला थी वो जिसे मैं ख़ुद से न जाने कब से छुपा रही थी अजब ख़बर थी कि जिसकी बाबत मैं ख़ुद से सच बोलते हुए...

ज़िन्दगी से डरते हो

ज़िन्दगी से डरते हो! ज़िन्दगी तो तुम भी हो, ज़िन्दगी तो हम भी हैं! ज़िन्दगी से डरते हो? आदमी से डरते हो आदमी तो तुम भी हो, आदमी...

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए...

रेडियो

हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उसको क्या सुनाता उठाके ले आया...

ज़ुल्म के ख़िलाफ़ नज़्में

1 ये जो अंधे हुक्मरां का हुक्म है आदमी के साथ कैसा ज़ुल्म है अपने रिश्तों और ज़मीनों पर मुदाम आदमी क्यों काग़ज़ों का हो ग़ुलाम कौन सा काग़ज़...

तुम नहीं आए थे जब

तुम नहीं आए थे जब, तब भी तो मौजूद थे तुम आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत दर्द की लौ की तरह,...

औरत और नमक

इज़्ज़त की बहुत-सी क़िस्में हैं घूँघट, थप्पड़, गन्दुम इज़्ज़त के ताबूत में क़ैद की मेख़ें ठोंकी गई हैं घर से लेकर फ़ुटपाथ तक हमारा नहीं इज़्ज़त हमारे गुज़ारे...

साँझ भई परदेस

बे-किवाड़ दरवाज़े राह देखते होंगे ताक़, बे-चराग़ों के इक किरन उजाले की भीख माँगते होंगे क्यों झिझक गए राही क्यों ठिठक गए राही ढूँढने किसे जाओ इंतिज़ार किसका हो रास्ते में कुछ साथी रह बदल...

कुत्ते

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते कि बख़्शा गया जिनको ज़ौक़-ए-गदाई ज़माने की फटकार सरमाया इनका जहाँ-भर की दुत्कार इनकी कमाई न आराम शब को, न राहत सवेरे ग़लाज़त...
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