मीरा और ख़ुसरो की नज़र
कौन हो तुम
और क्या हो
मेरी
जड़ हो
जल हो
गुल हो
फल हो
छाल तुम्हीं
तुम ही
जंगल हो
छाँव औ
आसरा
गाँव तुम्हीं
मैं
भटका
भूला
भूखा
बिसरा
भीत भिक्षु
बन बनवासी
तेरे गलियारों से
पगडण्डी मैं
चले चला
मेरा सिद्ध नाम
तुम अर्थ सभी
मिलना है...
रोटियों पर ख़ून के छींटें हैं
रोटियों पर ख़ून के छींटें हैं
हम ने तस्वीर देखी है
कटे हुए अंगों
सर, पैर, हाथ, बीच से
दो टुकड़े हुए शरीर पर
हरी-हरी घास डाल दी गई है
इन्हीं...
चंद रोज़ और मेरी जान
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प...
मेरे गीत तुम्हारे हैं
अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी, पसपाई भी
मौत के क़दमों की आहट भी, जीवन की अंगड़ाई भी
मुस्तक़बिल की किरनें भी थीं, हाल...
वो मर गई थी
उसके ज़हरी होंठ काले पड़ गए थे
उसकी आँखों में
अधूरी ख़्वाहिशों के देवताओं के
जनाज़े गड़ गए थे
उसके चेहरे की शफ़क़ का रंग
घायल हो चुका था
उसके जलते...
उनकी तस्वीर देखकर
आज क्या है जो मिला शोख़ निगाहों को क़रार?
क्या हुआ हुस्न की मासूम हयाओं का वक़ार
आज क्यूँ तुम मुझे देखे ही चले जाते हो?
दफ़अतन...
सोने से पहले एक ख़याल
मुझे नवम्बर की धूप की तरह मत चाहो
कि इसमें डूबो तो तमाज़त में नहा जाओ
और इससे अलग हो तो
ठण्डक को पोर-पोर में उतरता देखो
मुझे...
















