द्वारा 56 एपीओ

(सेना की ट्रेनिंग में माँ की लिखी चिट्ठियों से कुछ अंश) आरम्भ मैं कुशल से हूँ तुम्हारा कुशल क़ायम हेतु सदा ईश्वर से मनाया करती हूँ...

निर्जला

"मेरा व्यथित मन चीखना चाहता है और पूछना चाहता है कि निर्जला के माँस के गुलाबी रेशे किसके दाँतों में फँसे हैं?"

स्नेह भरी उँगली

"यहीं नौवीं में हिन्दी पढ़ाते समय जब किसी एक सहपाठी ने हमारे हिन्दी के शिक्षक को बताया कि मैं भवानी प्रसाद मिश्र का बेटा हूँ तो उन्होंने उसे 'झूठ बोलते हो' कह दिया था। बाद में उनने मुझसे भी लगभग उसी तेज आवाज में पिता का नाम पूछा था। घर का पता पूछा था, फिर किसी शाम वे घर भी आए। अपनी कविताएँ भी मन्ना को सुनाईं। मन्ना ने भी कुछ सुनाया था। उस टेंटवाले स्कूल में ऐसे कवि का बेटा? मन्ना की प्रसिद्धि हमें इन्हीं मापदण्डों, प्रसंगों से जानने मिली थीं।"

ऐसा देश है मेरा

“मुसलमानों, भारत छोड़ो!” “बाबर की औलादों, भारत छोड़ो!” “गर भारत में रहना है, तो वन्दे मातरम् कहना है!” “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को!” यही नारे...

वसई का क़िला

"मेरा बचपन इस क़िले की खुरदुरी और सख़्त दीवारों पर चलते, इस की ढलवानों पर पांव जमाकर खड़ी हुई बकरीयों का दीदार करते और इस के पेट में मौजूद घास के हरे क़ालीनों पर लेटते, खेलते और दौड़ते गुज़रा है। वसई का क़िला आज भी अपनी तहज़ीब में उतनी ही झुर्रियों को जगह देने का क़ाइल है, जिससे उस का सोलहवीं सदी वाला मेक-अप ख़राब ना हो।"

घर का पिछवाड़ा

वैसे तो घर का हर एक हिस्सा खास रहा, लेकिन घर के पिछवाड़े में मैनें अपना बचपन ज्यादा जिया है या यूं कहिये कि वो...

पापा

"वैसे भी वह डॉक्टर साहब भी मेरे पापा की तरह ही हैं। उनका बेटा रय्यान मेरा सहपाठी है और वह भी अपने पापा से 'एटीएम' के जैसे ही बात करता है, सिर्फ़ सवाल और जवाब। बल्कि मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में ज़्यादातर लड़कों और उनके पिताओं के बीच इसी तरह और इतना ही संवाद होता है।"

तस्वीर के तीन लोग

माँ को तस्वीर खिंचवाने का बड़ा शौक था। है नहीं, था। मेरे और छोटे भाई के बड़े होते जाने के साथ वह शौक ज़ईफ़...

भारतेंदु हरिश्चंद्र

जे सूरजते बढ़ि गए, गरजे सिंह समान तिनकी आजु समाधि पर, मूतत सियरा खान - भारतेंदु मैं सन् 1879 ई में गहमर स्कूल से मिडिल वर्नाक्यूलर...

प्रेमचंद जी – महादेवी वर्मा का संस्मरण

प्रेमचंदजी से मेरा प्रथम परिचय पत्र के द्वारा हुआ। तब मैं आठवीं कक्षा की विद्यार्थिनी थी!। मेरी 'दीपक' शीर्षक एक कविता सम्भवत: 'चांद' में...

एक शांत नास्तिक संत: प्रेमचंद

मुझे एक अफ़सोस है, वह अफ़सोस यह है कि मैं उन्हें पूरे अर्थों में शहीद क्यों नहीं कह पाता हूँ! मरते सभी हैं, यहाँ...

कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता

"हम मजरूह साहब के घर उन से मिलने जाते तो वह अपने बेडरूम में बैठे शतरंज खेलते रहते और हम लोगों से मिलने के लिए बाहर न निकलते। फिरदौस भाभी बेचारी लीपापोती करती रहतीं... कई और लेखक इस डर से कतरा जाते थे कि मैं कहीं मदद न माँग बैठूँ।..." राही मासूम रज़ा के इस संस्मरण में पढ़िए उनके उन दिनों की बातें जब वे बम्बई में तंग स्थिति में थे.. और उन दिनों में कैसे उन्होंने कुछ लेखक दोस्तों का साथ पाया!
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