मिट्टी के साथ बदल जाते हैं, सौन्दर्य के मानक
शांत साधक जैसे नयनों में खिंची काजल की एक महीन लकीर, माथे पर खिलखिलाती बड़ी-सी टिकुली, लज्जा से आरक्त मुख और सद्यःस्नाता देह की...
कहानी क्यों लिखता हूँ?
'साहित्य और संस्कृति' से
क्यों?... इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। जीवन में हम कोई भी काम क्यों करते हैं? हँसते क्यों हैं? रोते...
साम्प्रदायिकता और संस्कृति
प्रेमचंद का लेख 'साम्प्रदायिकता और संस्कृति' | 'Sampradayikta Aur Sanskriti', an article by Premchand
साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली...
नारी तुम केवल श्रद्धा हो
'आदमी की निगाह में औरत' से
दलितों के साथ स्त्रियों की दुर्दशा भी गाँधीजी का बहुत बड़ा सरोकार रही है। वह उनके सामाजिक सर्वोदय का...
निरुद्देश्य
'घुमक्कड़-शास्त्र' से
निरुद्देश्य का अर्थ है उद्देश्यरहित, अर्थात् बिना प्रयोजन का। प्रयोजन बिना तो कोई मंदबुद्धि भी काम नहीं करता। इसलिए कोई समझदार घुमक्कड़ यदि...
स्त्री के अर्थ-स्वातन्त्रय का प्रश्न
'शृंखला की कड़ियाँ' से
1
अर्थ सदा से शक्ति का अन्ध-अनुगामी रहा है। जो अधिक सबल था, उसने सुख के साधनों का प्रथम अधिकारी अपने आपको माना...
मैं लेखक कैसे बना
'टुकड़े-टुकड़े दास्तान' से
अपने बचपन और नौजवानी के दिनों का मानसिक वातावरण देखकर यह तो कह सकता हूँ कि अमुक-अमुक परिस्थितियों ने मुझे लेखक बना...
मेरे समकालीन: डॉ० भीमराव अम्बेडकर
डॉ० अम्बेडकर के प्रति और अछूतों का उद्धार करने की उनकी इच्छा के प्रति मेरा सद्भाव और उनकी होशियारी के प्रति आदर होने के...
समकालीन युवा लेखन पर कुछ विचार
जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते...
साहित्य सत्ता की ओर क्यों देखता है?
यह एक अजीब बात है कि इधर साहित्यकार में शिकवों और शिकायतों का शौक़ बढ़ता जा रहा है। उसे शिकायत है कि गवर्नर और...
















