अशोक कुमार की कविताएँ
साथ रहना कितना आसान है
सबकी अपनी भाषा थी
पहाड़ों की अपनी
नदियों की अपनी
और हमारी अपनी अलग
मैं, पहाड़ और नदियाँ
फिर भी साथ-साथ रहे
सबसे सूखे दिनों को
उदासी...
राहुल तोमर की कविताएँ
प्रतीक्षा
उसकी पसीजी हथेली स्थिर है
उसकी उँगलियाँ किसी
बेआवाज़ धुन पर थिरक रही हैं
उसका निचला होंठ
दाँतों के बीच नींद का स्वाँग भर
जागने को विकल लेटा हुआ...
त्रासदियों की नींव पर घटती नयी त्रासदियों की कहानी
‘एक देश बारह दुनिया’ पुस्तक अनूठे भाषा-प्रवाह और दृश्य-बिम्बों के कारण अपने पहले पन्ने से ही पाठकों को बांधकर आगे बढ़ती हुई नज़र आती...
अनुवाद का सौन्दर्य और ली मिन-युंग का काव्य-संसार
ली मिन-युंग ताइवान के प्रमुख साहित्यकारों में शुमार हैं। वे कवि, आलोचक, निबन्धकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके...
रुग्ण पिताजी, शव पिताजी, ख़त्म पिताजी, स्मृति-पिता
रुग्ण पिताजी
रात नहीं कटती? लम्बी, यह बेहद लम्बी लगती है?
इसी रात में दस-दस बारी मरना है, जीना है
इसी रात में खोना-पाना-सोना-सीना है
ज़ख़्म इसी में...
यदि आप महिला हैं, और लिखती हैं, तो दो बातें होंगी
'आलोचना का स्त्री पक्ष' सुजाता को अस्मिता-विमर्श की संश्लिष्ट धारा की प्रतिनिधि के रूप में सामने लाती है। वह गहन शोध द्वारा इतिहास के...
पायल भारद्वाज की कविताएँ
दुःख जुड़ा रहा नाभि से
नाराज़गी का बोझ उठा सकें
इतने मज़बूत कभी नहीं रहे मेरे कंधे
'दोष मेरा नहीं, तुम्हारा है'
यह कहने के बाद मन ने...
निकानोर पार्रा की कविताएँ (तीन)
मूल कविताएँ: चिलियन कवि निकानोर पार्रा
अंग्रेज़ी से अनुवाद: देवेश पथ सारिया
मैं अपना कहा सब कुछ वापस लेता हूँ
मृत्यु से पहले
इस अन्तिम इच्छा का अधिकारी...
बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के (चार)
आदमी, शरीर से ही नहीं थकता, मन से भी थकता है। मन से थका हुआ आदमी सहानुभूति का विषय है, शरीर से थका हुआ...
नज़्में : तसनीफ़
मैं और एक कुल्हाड़ी
इस बग़ीचे में
मैंने जितने पौदे लगाए हैं
किसी दिन अपनी उदासी की कुल्हाड़ी से
मैं ही उन्हें उखाड़ फेंकूँगा
मेरे अंदर वहशत के बीज...

















