स्वप्न-प्रसंग

तुमने कहा था एक बार गहरे स्वप्न में मिलोगी तुम कितने गहरे उतरूँ स्वप्न में कि तुम मिलो? एक बार मैं डूबा स्वप्न में इतना गहरा कि फिर उभरा...

किताब अंश: अविनाश कल्ला की किताब ‘अमेरिका 2020’

लेखक अविनाश कल्ला की किताब 'अमेरिका 2020 - एक बँटा हुआ देश' दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र होने की दावेदारी करने वाले देश—अमेरिका—के राष्ट्रपति चुनाव...

रूपांतरण

जब तक थे वे जंगलों में मांदर बजाते, बाँसुरी बजाते करते जानवरों का शिकार अधनंगे शरीर वे बहुत भले थे तब तक उनसे अच्छा था नहीं दूसरा कोई नज़रों में तुम्हारी छब्बीस...

वो उतना ही पढ़ना जानती थी

वो उतना ही पढ़ना जानती थी जितना अपना नाम लिख सके स्कूल उसको मज़दूरों के काम करने की जगह लगती थी जहाँ वे माचिस की डिब्बियों की तरह बनाते थे...

अभी आँखें खुली हैं और क्या-क्या देखने को

अभी आँखें खुली हैं और क्या-क्या देखने को मुझे पागल किया उसने तमाशा देखने को वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न...

तुम्हारे समाज की क्षय

मनुष्य सामाजिक पशु है। मनुष्य और पशु में अन्तर यही है कि मनुष्य अपने हित और अहित के लिए अपने समाज पर अधिकतर निर्भर...

माया एंजेलो की कविता ‘मैं फिर भी उठती हूँ’

तुम मेरा इतिहास लिख सकते हो अपने कड़वे, मुड़े-तुड़े झूठों से तुम मुझे गंदगी में कुचल सकते हो फिर भी, धूल की तरह, मैं उठूँगी। क्या मेरी उन्मुक्तता...

ईश्वर से अधिक हूँ

एक पूरी आत्मा के साथ एक पूरी देह हूँ मैं जिसे धारण करते हैं ईश्वर कभी-कभी मैं एक आत्मा एक देह एक ईश्वर से अधिक हूँ। ईश्वर युगों में सुध...

हमारी नींद

मेरी नींद के दौरान कुछ इंच बढ़ गए पेड़ कुछ सूत पौधे अंकुर ने अपने नाम-मात्र, कोमल सींगों से धकेलना शुरू की बीज की फूली हुई छत, भीतर से। एक मक्खी...

मरूँगा नहीं

दूसरे-दूसरे कारणों से मारा जाऊँगा बहुत अधिक सुख से अकठिन सहज यात्राविराम से या फिर भीतर तक बैठी जड़ शान्ति से लेकिन नहीं मरूँगा कुशासन की कमीनी चालों से आए दिन के...

घास

दुनिया के तमाम शहरों से खदेड़ी हुई जिप्सी है वह तुम्हारे शहर की धूल में अपना खोया हुआ नाम और पता खोजती हुई आदमी के जनतन्त्र में घास के सवाल...

विनोद कुमार शुक्ल – ‘नौकर की कमीज़’

विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास 'नौकर की कमीज़' से उद्धरण | Quotes from 'Naukar Ki Kameez', a novel by Vinod Kumar Shukla चयन एवं प्रस्तुति:...
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