रडयार्ड किपलिंग की कविता ‘अगर’

Poem: 'If' - Rudyard Kipling अनुवाद: प्रीता अरविन्द अगर आपके आसपास लोग ग़लतियाँ कर उसका ठीकरा आपके सर फोड़ें और आप शांत रहें, अगर सभी लोग आप पर संदेह करें...

वहम

मूल कविता: 'वहम' - विजय राही अनुवाद: असना बद्र जब भी सोचा मौत के बारे में मैंने चंद चेहरे रूबरू से आ गए वो जो करते हैं मोहब्बत बे...

जातियों का बनना

'Jaatiyon Ka Banana', a letter from Jawaharlal Nehru to his daughter Indira Gandhi अनुवाद: प्रेमचंद मैंने पिछले ख़तों में तुम्हें बतलाया है कि शुरू में जब...

जेम्स पैट्रिक किनी की कविता ‘अन्दर की सर्दी’

Poem: 'The Cold Within' by James Patrick Kinney अनुवाद: प्रीता अरविन्द पूस की घनी अँधेरी सर्द रात में छः राहगीर जो एक-दूसरे से परिचित न थे, एक मुसाफ़िरख़ाने में बैठे...

छोड़ना होगा

मूल कविता: सुजाता महाजन अनुवाद: सुनीता डागा छोड़ना होगा उम्र के चालीसवें पड़ाव पर आँख मूँदकर जीने की परिपाटी को, दिन रेत की तरह हाथ से फिसलता जाता हो तब नहीं...

विलियम बी. ड्रीस की कहानी ‘सृष्टि कथा’

दार्शनिक, प्रशिक्षित भौतिकविज्ञानी और धर्मशास्त्री विलियम बी. ड्रीस 2015 से तिलबुर्ग स्कूल ऑफ ह्यूमनिटिज़ में डीन और प्रोफ़ेसर के रूप में सेवाएँ दे रहे हैं।...

रामस्वरूप किसान की कविताएँ

कविता संग्रह 'आ बैठ बात करां' से चयन व अनुवाद: राजेन्द्र देथा कितने भोले हैं वे मैं उनके सामने औरों की तरह हाथ बाँधकर नहीं जाता न ही दाँत निकाल पूँछ हिलाता उनके समक्ष उनके...

सभ्यता क्या है?

'Sabhyata Kya Hai', a letter from Jawaharlal Nehru to his daughter Indira Gandhi अनुवाद: प्रेमचंद मैं आज तुम्हें पुराने ज़माने की सभ्यता का कुछ हाल बताता...

पीटर हैंडकी की कविता ‘दूरियाँ’

Excerpt from a poem 'To Duration' by Peter Handke अनुवाद: उपमा 'ऋचा' न जाने कब से मैं दूरियों के बारे में लिखना चाहता था। कोई निबन्ध नहीं कोई नाटक नहीं कोई...

लियोपोल्ड स्टाफ की कविताएँ

Poems by Leopold Staff, a Polish poet अनुवाद: आदर्श भूषण क्या तुम? तुम मुझे बुलबुल, गुलाबों और चाँद की प्रशंसा करने से मना करते हो, ये शायद लगते हों...

बनलता सेन

मूल बंगला कविता: जीवनानंद दास | Poem by Jibanananda Das अनुवाद: सुशील कुमार झा हजारों वर्ष तक भटकता रहा इस धरा के पदचिन्हों पर, नीरव अन्धकार में ही,...

बीस साल बाद

मूल बंगला कविता: जीवनानंद दास | Poem by Jibanananda Das अनुवाद: सुशील कुमार झा बीस साल बाद एक बार फिर अगर मिल जाओ तुम? कम नहीं होते...
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