किताब अंश: ‘सुहाग के नुपूर’ – अमृतलाल नागर
हिन्दी के मशहूर साहित्यकार अमृतलाल नागर का जन्म 17 अगस्त 1916 को हुआ था। उन्होंने नाटक, रेडियोनाटक, रिपोर्ताज, निबन्ध, संस्मरण, अनुवाद, बाल साहित्य आदि...
अन्धेरे के बारे में कुछ वाक्य
अन्धेरे में सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि वह किताब पढ़ना
नामुमकिन बना देता था।
पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या किताब से डरता था
उसके मन...
कितनी कम जगहें हैं प्रेम के लिए
कितना तो सहज होता है
मौसम का यूँ ही मीठा हो जाना
शेफालियों का अनायास झर जाना
बारिशों का सोंधा हो जाना
भर जाना आकाश का सम्भावनाओं से
और...
मिलने की तरह मुझसे वो पल भर नहीं मिलता
मिलने की तरह मुझसे वो पल भर नहीं मिलता
दिल उससे मिला जिससे मुक़द्दर नहीं मिलता
ये राह-ए-तमन्ना है, यहाँ देख के चलना
इस राह में सर...
हम ने काटी हैं तेरी याद में रातें अक्सर
हम ने काटी हैं तेरी याद में रातें अक्सर
दिल से गुज़री हैं सितारों की बरातें अक्सर
और तो कौन है जो मुझको तसल्ली देता
हाथ रख...
किताब अंश: ‘मित्रो मरजानी’ – कृष्णा सोबती
'मित्रो मरजानी' हिन्दी का एक ऐसा उपन्यास है जो अपने अनूठे कथा-शिल्प के कारण चर्चा में आया। इस उपन्यास को जीवन्त बनाने में 'मित्रो'...
प्रेम की डाक
ईश्वर के हरकारे
चल पड़े हैं
प्रेम की डाक लेकर
वसंत ऋतु में
उनके पास सभ्यता के
प्रथम प्रेम की स्मृतियों की
अनन्त कहानियाँ हैं
रोशनी के आलोक में जब
शहर स्थिर...
एक काला रंग
एक काला रंग चुनो
उसमें जो
लाल हरी नीली ऊर्जा है
उसे बाहर लाओ
उसमें जो
लगातार दौड़ रहे हैं घोड़े,
स्त्री, पुरुष, बच्चे
हँस रहे हैं,
उनके संग झुण्ड बनाकर
नाचो
एक पत्थर...
अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
कोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानों की
अपनी पोशाक से हुश्यार कि ख़ुद्दाम-ए-क़दीम
धज्जियाँ माँगते हैं अपने गरेबानों...
पुराना सवाल
पहले खेत बिके
फिर घर, फिर ज़ेवर
फिर बर्तन
और वो सब किया जो ग़रीब और अभागे
तब से करते आ रहे हैं जब से यह दुनिया बनी
पत्नी...

















