अहमद मिक़दाद की कविता ‘बीस बुलेट’
कविता: 'बीस बुलेट' (Twenty Bullets)
मूल कवि: अहमद मिक़दाद (Ahmed Miqdad)
अनुवाद: योगेश ध्यानी
मैं अपनी स्वतंत्रता के बारे में सोचते हुए
एक निर्दोष पक्षी की तरह
अपनी पवित्र...
डेविड बॉटम्स की कविता ‘पिता का बायाँ हाथ’
कविता: पिता का बायाँ हाथ (My Father's Left Hand)
कवि: डेविड बॉटम्स (David Bottoms)
अनुवाद: आदर्श भूषण
कभी-कभी पिता का हाथ उनके घुटनों पर फिरता है
अजीब गोलाइयों...
जॉन गुज़लॉवस्की की कविता ‘मेरे लोग’
जॉन गुज़लॉवस्की (John Guzlowski) नाज़ी यातना कैम्प में मिले माता-पिता की संतान हैं। उनका जन्म जर्मनी के एक विस्थापित कैम्प में हुआ। उनके माता-पिता...
पिटाई विमर्श में शान्तिदूत : ‘स्वाँग’ से किताब अंश
'स्वाँग' ज्ञान चतुर्वेदी का नया उपन्यास है, एक गाँव के बहाने समूचे भारतीय समाज के विडम्बनापूर्ण बदलाव की कथा इस उपन्यास में दिलचस्प ढंग...
शिवेन्द्र – ‘चंचला चोर’
शिवेन्द्र के उपन्यास 'चंचला चोर' से उद्धरण | Quotes from 'Chanchala Chor', a novel by Shivendra
चयन: विक्रांत (शब्द अन्तिम)
"अँधेरे में, कुछ न कुछ अब...
शैरन ओल्ड्स की कविता ‘उनकी चुप्पी’
शैरन ओल्ड्स (Sharon Olds) अमेरिकी कवयित्री हैं और न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में क्रिएटिव राइटिंग पढ़ाती हैं। उन्हें कविता में पुलत्ज़र पुरस्कार प्राप्त है। यहाँ...
दिवंगत पिता के प्रति
1
सूरज के साथ-साथ
सन्ध्या के मंत्र डूब जाते थे,
घण्टी बजती थी अनाथ आश्रम में
भूखे भटकते बच्चों के लौट आने की,
दूर-दूर तक फैले खेतों पर,
धुएँ में...
ख़ुदा का चेहरा
एक दिन मैं शराब पीकर
शहर के अजायबघर में घुस गया
और पत्थर के एक बुत के सामने खड़ा हो गया।
गाइड ने मुझे बताया
यह ख़ुदा का...
पहली कविता की आख़िरी शाम
पहली कविता की आख़िरी शाम
नीले दरख़्तों के साए में तुम्हारे
बेचैन हाथ
पीले पड़ते हुए।
क्राटन के लम्बे पत्तों की तरह हिलते हैं
यों दरख़्त भव्य काले हैं
घनी...
तुम्हारे सदाचार की क्षय
व्यभिचार
सद्-आचार अर्थात श्रेष्ठ पुरुषों का आचार। श्रेष्ठ किसे कहते हैं? क्या श्रेष्ठ की कोटि में उस ग़रीब की गिनती हो सकती है जो ईमानदारी...
जीतेंद्र, घुघरी और वीकेण्ड
साभार: किताब: जीरो पीरियड | लेखक: अविनाश सिंह तोमर | प्रकाशन: एका वेस्टलैण्ड / हिन्द-युग्म
"गोलू, ओये गोलू! पिक्चर शुरू हो गई, नम्बरिंग स्टार्ट है,...
पास आना मना
पास आना मना
दूर जाना मना,
ज़िन्दगी का सफ़र
क़ैदख़ाना बना।
चुप्पियों की परत
चीरती जा रही
चीख़-चीत्कार
बेइन्तिहा दूर तक,
पत्थरों के बुतों में
बदलने लगे
साँस लेते हुए
सब मकाँ दूर तक
भागकर आ...

















