स्मृतियाँ एक दोहराव हैं

उत्कण्ठाओं के दिन नियत थे प्रेम के नहीं थे चेष्टाओं की परिमिति नियत थी इच्छाओं की नहीं थी परिभाषाएँ संकुचन हैं जो न कभी प्रेम बांध पायीं न देह स्मृतियाँ एक...

‘अन्दाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा’ : रवींद्र कालिया की स्मृति गाथा

किताब: 'अन्दाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा लेखिका: ममता कालिया टिप्पणी: देवेश पथ सारिया 'अन्दाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा' वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया की सद्यःप्रकाशित किताब है, जिसमें उन्होंने अपने...

प्रेम को झुर्रियाँ नहीं आतीं

बुढ़िया ने गोद में रखा अपने बुड्ढे का सिर और मालिश करने लगी सिर के उस हिस्से में भी जहाँ से बरसों पहले विदा ले चुके थे बाल दोनों को...

तुम्हारे बाद

तुम्हें दफ़नाकर जाने वाले जानते हैं अपनी भाग-दौड़ तुम्हारी दवाइयों के लिए, वे नहीं जानते तुम्हारे साँस लेने के परिश्रम को वे जानते हैं गुहार जो लगायी उन्होंने, तुम्हारे...

आलिंगन

आलिंगन हवाओं का। और ऐसा भी कि गुज़र ही न सके हवा बीच उसके। और वह भी कि हल्का हो स्पर्श। हो बस सरसराहट एक वस्त्रों की। कंधे पर, पीठ पर...

यशस्वी पाठक की कविताएँ

कविताएँ: यशस्वी पाठक एक कवि और लेखकों की शामें दोस्तों के साथ या सड़कों पर गश्त लगाते गुज़रती हैं जहाँ गर्भ धारण करते हैं उनके मस्तिष्क जिससे जन्म...

विपश्यना

सहजता से कहे गए शब्दों के अर्थ अक्सर चेष्टापूर्ण और कठिन होते हैं जैसे तुमने कहा कि तुम्हें मेरा मौन काटता है और उससे...

शुरू का रहन-सहन

अनुवाद: प्रेमचंद सरग़नाओं और राजाओं की चर्चा हम काफ़ी कर चुके। अब हम उस ज़माने के रहन-सहन और आदमियों का कुछ हाल लिखेंगे। हमें उस पुराने...

बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के (तीन)

कल रात मैंने चश्मे के टूटे हुए काँच को जोड़ते हुए महसूस किया कि टूटे हुए को जोड़ना बहुत धैर्य का काम है। इसके...

मनुष्य

दिखते रहने के लिए मनुष्य हम काटते रहते हैं अपने नाख़ून छँटवाकर बनाते-सँवारते रहते हैं बाल दाढ़ी रोज़ न सही तो एक दिन छोड़कर बनाते ही रहते हैं जो...

जीवन बचा है अभी

जीवन बचा है अभी ज़मीन के भीतर नमी बरक़रार है बरक़रार है पत्थर के भीतर आग हरापन जड़ों के अन्दर साँस ले रहा है! जीवन बचा है अभी रोशनी...

ख़ुदा होने के लिए

किस जाति या भाषा का मंसूबा तुम हो ठीक है पर इतनी बड़ी देह में कहीं रोयाँ भर वह जगह है जिस पर उँगली रख तुम...
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