प्रेम व्यापार
किसी दिन तुमने कह दिया कि दिखाओ नदी
असल और सच्ची। तो मैं क्या करूँगा?
आज तो यह कर सकता हूँ—घर के सीले कोने में जाकर...
‘वर्षा में भीगकर’ से कविताएँ
काव्य-संकलन: 'वर्षा में भीगकर'
प्रकाशन: किताबघर प्रकाशन
सुबह दे दो
मुझे मेरी सुबह दे दो
सुबह से कम कुछ भी नहीं
सूरज से अलग कुछ भी नहीं
लाल गर्म सूरज
जोंक...
ओछा है मेरा प्यार
कितना अकेला कर देगा मेरा प्यार
तुमको एक दिन
अकेला और सन्तप्त
अपनी समूची देह से मुझे सोचती हुईं
तुम जब मुस्कुराओगी—औपचारिक!
प्यार मैं तुम्हें तब भी करता रहूँगा
शायद...
‘चलो’—कहो एक बार
'चलो'
कहो एक बार
अभी ही चलूँगी मैं—
एक बार कहो!
सुना तब 'हज़ार बार चलो'
सुना—
आँखें नम हुईं
और
माथा उठ आया।
बालू ही बालू में
खुले पैर, बंधे हाथ
चांदी की जाली...
पतझड़ की आवाज़
अनुवाद: शम्भु यादव
सुबह मैं गली के दरवाज़े में खड़ी सब्ज़ीवाले से गोभी की क़ीमत पर झगड़ रही थी। ऊपर रसोईघर में दाल-चावल उबालने के...
पिताजी का समय
अपने घर में मैं परम स्वतंत्र था। जैसे चाहे रहता, जो चाहे करता। मर्ज़ी आती जहाँ जूते फेंक देता, मन करता जहाँ कपड़े। जगह-जगह...
तेरे वाला हरा
चकमक, जनवरी 2021 अंक से
कविता: सुशील शुक्ल
नीम तेरी डाल
अनोखी है
लहर-लहर लहराए
शोखी है
नीम तेरे पत्ते
बाँके हैं
किसने तराशे
किसने टाँके हैं
नीम तेरे फूल
बहुत झीने
भीनी ख़ुशबू
शक्ल से पश्मीने
नीम...
होने की सुगन्ध
यही तो घर नहीं और भी रहता हूँ
जहाँ-जहाँ जाता हूँ, रह जाता हूँ
जहाँ-जहाँ से आता हूँ, कुछ रहना छोड़ आता हूँ
जहाँ सदेह गया नहीं
वहाँ...

















