सावित्रीबाई फुले का ज्योतिबा फुले को पत्र
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प्रिय सत्यरूप जोतीबा जी को
सावित्री का प्रणाम,
आपको पत्र लिखने की वजह यह है कि मुझे कई दिनों से बुख़ार हो रहा...
‘खोई चीज़ों का शोक’ से कविताएँ
सविता सिंह का नया कविता संग्रह 'खोई चीज़ों का शोक' सघन भावनात्मक आवेश से युक्त कविताओं की एक शृंखला है जो अत्यन्त निजी होते...
कविताएँ: दिसम्बर 2021
आपत्तियाँ
ट्रेन के जनरल डिब्बे में चार के लिए तय जगह पर
छह बैठ जाते थे
तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होती थी
स्लीपर में रात के समय...
कविताएँ: दिसम्बर 2021
अंशतः अमान्य विचारों का समीकरण
वह प्रभावकारी नहीं है
उसमें संवेदन को परिवर्तित करने की क्षमता नहीं
उससे समाज नहीं बनता है
उसके स्रष्टा दो-तीन प्रकार के नहीं...
‘दलित पैंथर ने दलित साहित्य का भूमण्डलीकरण किया’
दलित पैंथर के संस्थापक ज. वि. पवार से राजश्री सैकिया की बातचीत
ज. वि. पवार दलित-पैंथर के संस्थापकों में एक रहे हैं। इस संगठन ने...
बाज़ार का हँसना लाज़िम है
सब कुछ बाज़ार का हिस्सा है
ख़रीदी जा रही हर चीज़ के बदले
चुकायी जा रही है एक क़ीमत
किस स्वेटर में कितनी गर्माहट हो
यह ग्राहक को...
जयशंकर प्रसाद की तुमुल-कोलाहलपूर्ण जीवन-गाथा
उपन्यास: 'कंथा'
लेखक: श्याम बिहारी श्यामल
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
समीक्षा/टिप्पणी: संगीता पॉल
हिन्दी की साहित्यिक दुनिया से वास्ता रखने वाला हर व्यक्ति जयशंकर प्रसाद के साहित्य से परिचित...
आपके गणतंत्र की एक स्त्री की प्रेमकथा
एक स्त्री प्यार करना चाहती थी
लेकिन प्यार करने से चरित्र नष्ट होता है
स्त्री प्यार करना चाहती थी
किन्तु चरित्र नहीं नष्ट करना चाहती थी
एक स्त्री...
सुना है कभी तुमने रंगों को
कभी-कभी
उजाले का आभास
अंधेरे के इतने क़रीब होता है
कि दोनों को अलग-अलग
पहचान पाना मुश्किल हो जाता है।
धीरे-धीरे
जब उजाला
खेलने-खिलने लगता है
और अंधेरा उसकी जुम्बिश से
परदे की...
क़ानूनी कुमार
मि. क़ानूनी कुमार, एम.एल.ए. अपने ऑफ़िस में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और रिपोर्टों का एक ढेर लिए बैठे हैं। देश की चिन्ताओं से उनकी देह स्थूल...
कविताएँ: दिसम्बर 2021
एक यूँ ही मौत
जिन दिनों
मैं उलझ रहा था अपनी नींद से
जिन दिनों
मैं तोते की तरह रट रहा था ऐतिहासिक तथ्य
जिन दिनों
रातें बड़ी मुश्किल से...

















