इलाहाबादी

काफ़े रेस्त्राँ में हिलमिल कर बैठे। बातें कीं; कुछ व्यंग्य-विनोद और कुछ नये टहोके लहरों में लिए-दिए। अपनी-अपनी घातें रहे ताकते। यों, भीतर-भीतर मन दो के एक न...

जॉन डन की कविता ‘मैं इसलिए नहीं जा रहा हूँ’

कविता: 'मैं इसलिए नहीं जा रहा हूँ' ('Sweetest love, I do not go') कवि: जॉन डन (John Donne) भावानुवाद: दिव्या श्री मेरी प्यारी महबूबा! मैं इसलिए नहीं जा...

किताब अंश: ‘परियों के बीच’ – रूथ वनिता

रूथ वनिता का उपन्यास 'परियों के बीच' एक ऐसे कोमल अहसास और रिश्ते का संसार हमारे सामने उजागर करता है जिसका वजूद हमेशा से...

शरणार्थी

1. मानव की आँख कोटरों से गिलगिली घृणा यह झाँकती है। मान लेते यह किसी शीत-रक्त, जड़-दृष्टि जल-तलवासी तेंदुए के विष नेत्र हैं और तमजात सब जन्तुओं से मानव...

पीठ

1 बोझा ढोते-ढोते इस देश की पीठ इतनी झुक गयी है कि पलटकर किए जाने वाले काम स्वतंत्रता या संविधान की तरह माने जा चुके हैं किसी पौराणिक गप्प का हिस्सा। 2 राजनीति— नियमों...

अपने को देखना चाहता हूँ

मैं अपने को खाते हुए देखना चाहता हूँ किस जानवर या परिन्दे की तरह खाता हूँ मैं मिट्ठू जैसे हरी मिर्च कुतरता है या बन्दर गड़ाता है...

पता

मैंने उसे ख़त लिखा था और अब पते की ज़रूरत थी मैंने डायरियाँ खँगालीं किताबों के पुराने कबाड़ में खोजा फ़ोन पर कई हितैशियों से पूछा और हारकर बैठ...

वो लड़की

लड़की जानती है उसके हाथों में सुख की रेखाएँ हल्की हैं वह समय के बर्तन में भय को घोंटते हुए साहस निथार रही है उसे जीवन के कान...

अमीरी रेखा

मनुष्य होने की परम्परा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ ऐसा होता...

कहाँ हो तुम

मृत्यु का भय ईश्‍वर के भय को सींचता रहता है ओ मेरे कवि प्रार्थनाएँ करते-करते सदियों के पंख झड़ चुके हैं ऋतुचक्रों पर फफूँद बैठी है ईश्‍वर ग़रीबों की तरफ़...

मनोहर श्याम जोशी – ‘कसप’

मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास 'कसप' से उद्धरण | Quotes from 'Kasap', a novel by Manohar Shyam Joshi प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन चयन: पुनीत कुसुम मुझे तो समस्त...

साग-मीट

साग-मीट बनाना क्‍या मुश्किल काम है! आज शाम खाना यहीं खाकर जाओ, मैं तुम्‍हारे सामने बनवाऊँगी, सीख भी लेना और खा भी लेना। रुकोगी...
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