हो सकता था
इतनी बड़ी दुनिया में कहीं जा नहीं रहा हूँ
भीतर और बाहर जगहें छोड़ता
शून्य से हटता हूँ।
किसी की ओर बढ़ता हुआ मैं हो सकता था
बहुत...
मेरे पास नहीं है श्रद्धा
मुझ पर गर्वित अहम्-भाव का शासन नहीं चलेगा
किन्तु स्वयं झुककर तुम मुझे झुका लो, जितना मन हो।
ऊँचे से ऊँचे पर्वत से ऊँचा मेरा माथा
पर...
पुनर्रचनाएँ
(ये कविताएँ पहाड़ के दूर-दराज़ क्षेत्रों के ऐसे लोकगीतों से प्रेरित हैं जिन्हें लोक कविताएँ कहना ज़्यादा सही होगा पर ये उनके अनुवाद नहीं...
बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के (एक)
बहुत बुरा वक़्त है। ऐसा लगा था सब ठीक होने वाला है। लेकिन बुरा वक़्त इतनी जल्दी पीछा कहाँ छोड़ता है? श्मशान लाशों से...
ईश्वर की आँखें
क्या रह जाता है मृत्यु के बाद
जब पार हो जाती है देहरी
जीवितों और मृतों के बीच?
क्या तब पार हो जाएँगी सारी
सुबहें और रातें भी
स्मृति...
अंधेरे के नाख़ून
एक छोर से चढ़ता आता है
रोशनी को लीलता हुआ एक ब्लैक होल,
अंधेरे का नश्तर चीर देता है आसमान का सीना,
और बरस पड़ता है बेनूर...
लाठी भी कोई खाने की चीज़ होती है क्या?
हमारे देश में लाठियाँ कब आयीं
यह उचित प्रश्न नहीं
कहाँ से आयीं
यह भी बेहूदगी भरा सवाल होगा
लाठियाँ कैसे चलीं
कहाँ चलीं
कहाँ से कहाँ तक चलीं
क्या पाया...
कुछ समुच्चय
स्मृति की नदी
वह दूर से बहती आती है, गिरती है वेग से
उसी से चलती हैं जीवन की पनचक्कियाँ
वसंत-1
दिन और रात में नुकीलापन नहीं है
मगर...
हम मारे गए
हमें डूबना ही था
और हम डूब गए
हमें मरना ही था
और हम मारे गए
हम लड़ रहे थे
कई स्तरों पर लड़ रहे थे
हमने निर्वासन का दंश...
तुम्हारे धर्म की क्षय
वैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है। एक पूरब मुँह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर। एक...
















